अब जानिए, क्या है पूरा मामला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी मुन्ना पांडे ने एक जून 2015 को अपने घर टीवी देखने आई 11 साल की नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया था। दुष्कर्म के बाद आरोपी ने गला घोंटकर पीड़िता की हत्या कर दी। मामले में भागलपुर की एक ट्रायल कोर्ट ने 2017 में मुन्ना को हत्या और दुष्कर्म का दोषी माना और उसे मृत्युदंड दे दिया। मुन्ना ने इसके खिलाफ पटना हाईकोर्ट में याचिका लगाई, जिसे 2018 में खारिज कर दी गई। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को यथावत रखते हुए मौत की सजा बरकरार रखी। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ मुन्ना ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए याचिका दाखिल की।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनाया यह फैसला
मुन्ना की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति बी आर गवई, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई उलट-पुलट हो गई। हमने पटना उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया है। नए सिरे से मामले की सुनवाई और नए फैसले के लिए इसे वापस उच्च न्यायालय भेज रहे हैं। बेंच ने कहा कि पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से कहा गया है कि मामला एक ऐसी पीठ को सौंपे, जो शीघ्रता से फैसला करे। यह ध्यान में रखें कि आरोपी नौ वर्षों से जेल में है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि बहस के लिए आरोपी को वकील की सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना सरकार को लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एहतियातन हिरासत कानून का इस्तेमाल करने के लिए तेलंगाना पुलिस की आलोचना की और कहा कि जब देश आजादी के 75 साल पूरे होने के मौके पर 'आजादी का अमृत महोत्सव' मना रहा है, कुछ पुलिस अधिकारी लोगों की आजादी पर अंकुश लगा रहे हैं। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने एक बंदी के पति के खिलाफ पारित हिरासत आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।
पीठ ने कहा,'हमें तेलंगाना राज्य के अधिकारियों को यह याद दिलाना है कि अधिनियम के कठोर प्रावधानों को एक झटके में लागू नहीं किया जाना चाहिए।' उन्होंने कहा, 'जब राष्ट्र विदेशी शासन से स्वतंत्रता के 75 वर्ष मनाने के लिए आजादी का अमृत महोत्सव मनारहा है, तो राज्य के कुछ पुलिस अधिकारी संविधान द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों से अनजान प्रतीत होते हैं और लोगों की स्वतंत्रता और स्वतंत्रता पर अंकुश लगा रहे हैं। जितनी जल्दी इस प्रवृत्ति को समाप्त किया जाए, उतना ही अच्छा है।'
नफरती भाषण मामले में अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से राहत
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सीपीआई (एम) नेता बृंदा करात की याचिका पर सुनवाई तीन अक्तूबर तक के लिए स्थगित कर दी है। इसमें सीएए विरोधी प्रदर्शनों पर कथित नफरती भाषणों के लिए भाजपा नेताओं-अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है। इससे पहले, हाईकोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने के इन्कार करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील खारिज कर दी थी। करात ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। दिल्ली पुलिस की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू की ओर से सोमवार को स्थगन का अनुरोध करने के बाद जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस पंकज मिथल की पीठ ने मामले को तीन अक्तूबर तक के लिए स्थगित कर दिया। हालांकि शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले में प्रतिवादी को कोई और स्थगन नहीं दिया जाएगा।