सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसलेे में कहा कि अगर लड़का बालिग है और उसकी उम्र शादी योग्य (21 साल) नहीं है तो भी वह बालिग लड़की के साथ लिव इन में रह सकता है। कोर्ट ने कहा कि लिव इन संबंध को संसद की भी मान्यता है। कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि दो वयस्क अपनी मर्जी से शादी के बिना भी एक साथ जिंदगी गुजार सकते हैं।
जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने अपने आदेश में केरल हाईकोर्ट के शादी रद्द करने का फैसला पलट दिया। पीठ ने शादी को बहाल करते हुए युवती को उसके पति से मिला दिया।
हाईकोर्ट ने एक हैबियस कोरपस याचिका में शादी को रद्द करते हुए युवती को उसके पिता को सौंप दिया था। पीठ ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के हदिया उर्फ अखिला मामले में दिए हालिया फैसले को आधार बनाया जिसमें उसे अपने मुस्लिम पति के साथ रहने की इजाजत दी थी।
अदालत को सुपर अभिभावक की भूमिका नहीं निभानी चाहिए : पीठ
पीठ ने कहा कि अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने के लिए एक बालिग लड़की के अधिकार को उसके पिता द्वारा कम नहीं किया जा सकता है। इस मामले में पसंद की स्वतंत्रता युवती की होगी कि वह किसके साथ रहना चाहती है। अदालत को मां की किसी भी तरह की भावना या पिता के अहंकार से प्रेरित एक सुपर अभिभावक की भूमिका नहीं निभानी चाहिए।
यह है मामला
12 अप्रैल 2017 में तुषारा ने नंदकुमार के साथ शादी कर ली थी। विवाह के समय तुषारा की उम्र 19 साल और नंदकुमार की उम्र 20 साल थी। तुषारा के पिता ने उसको अगवा किए जाने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पिता की याचिका पर केरल हाईकोर्ट ने कहा था कि लड़के की उम्र शादी की नहीं है जबकि लड़की की है। ऐसे में वह कानूनन पत्नी नहीं है। दोनों शादीशुदा हैं, इसके ठोस सबूत भी पेश नहीं किए गए। कोर्ट ने दोनों की शादी रद्द कर दी थी। इसके खिलाफ नंदकुमार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।