गौरतलब है कि नागराज मामले में पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 2006 के अपने फैसले में कहा था कि एससी-एसटी समुदाय के लोगों को नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण दिए जाने से पहले राज्य सरकारें एससी-एसटी के पिछड़ेपन पर उनकी संख्या बताने वाले आंकड़े, सरकारी नौकरियों में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के बारे में तथ्य और समग्र प्रशासनिक दक्षता पर जानकारी मुहैया कराने के लिए बाध्य हैं।
केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों ने विभिन्न आधारों पर इस फैसले पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया था। इसमें एक आधार यह था कि एससी-एसटी समुदाय के लोगों को पिछड़ा माना जाता है और जाति को लेकर उनकी स्थिति पर विचार करते हुए उन्हें नौकरियों में पदोन्नति में भी आरक्षण दिया जाना चाहिए।
केंद्र सरकार ने कहा था कि एम. नागराज मामले में एससी-एसटी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ दिए जाने में गैर-जरूरी शर्तें लगाई गई थीं। इसलिए केंद्र ने इस पर फिर से विचार करने के लिए इसे बड़ी पीठ के पास भेजने का अनुरोध किया था।
केंद्र की तरफ से पेश हुए अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने एससी-एसटी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण दिए जाने के पक्ष में दलीलें देते हुए कहा था कि पिछड़ेपन की धारणा उनके पक्ष में है।
उन्होंने कहा था कि एससी-एसटी समुदाय लंबे समय से जातिगत भेदभाव का सामना कर रहा है और इस तथ्य के बाद भी जाति का कलंक उनसे जुड़ा हुआ है कि इस समुदाय के कुछ लोग अच्छी स्थिति में पहुंचे हैं।
इनपुट: भाषा