सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान गंगा नदी में लाशों के तैरने की खबरों के मद्देनजर मृतकों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक नीति बनाने के निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।
जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा कि समस्या गंभीर है लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इसके लिए उचित मंच है जो इस मुद्दे का ध्यान रख सकता है। एनजीओ ट्रस्ट डिस्ट्रेस मैनेजमेंट कलेक्टिव ने एक याचिका दायर कर एक विशिष्ट कानून बनाने पर जोर दिया था जिससे मृतकों के अधिकारों की रक्षा की जा सके।
याचिका में शीर्ष अदालत से सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए दाह संस्कार और एंबुलेंस सेवाओं के लिए दरें निर्धारित करने को लेकर दिशा-निर्देश जारी करने जी मांग की गई थी। दिशा-निर्देशों का अनुपालन न होने पर जल्द दंडात्मक कार्रवाई करने की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने गंगा नदी में शव मिलने की घटनाओं की पृष्ठभूमि में मृतकों के अधिकारों की रक्षा के लिए नीति बनाने के निर्देश देने की मांग की। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता संगठन ने हाईकोर्ट के समक्ष इस मुद्दे को उठाया, लेकिन अभी तक इस संबंध में कुछ हो नहीं पाया है।
इस पर पीठ ने वकील से कहा, आप राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में जाएं। आप कितने मंचों पर संपर्क करेंगे? आप पहले ही हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा चुके हैं। हाईकोर्ट ने एक निर्देश दिया है। एनएचआरसी ने हस्तक्षेप किया है। याचिका में 14 मई को जारी आयोग की एडवाइजरी का भी हवाला दिया गया था जिसमें मृतकों की गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र और सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को 11 सिफारिशें दी गई हैं।