जनहित याचिका में केंद्र और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को यह निर्देश देने का आग्रह किया गया था कि बार निकायों का चुनाव लड़ने वालों को किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं होना चाहिए। पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा, ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी राजनीतिक दल के सक्रिय सदस्य को बार निकायों का चुनाव लड़ने से रोकता हो। आप चाहते हैं कि हम कानून बनाएं। क्षमा करें, ऐसा नहीं हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में हमेशा अलग-अलग विचारधाराओं के लिए जगह होती है, लेकिन उन मान्यताओं को संविधान के अनुरूप होना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने एक वकील की तरफ से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई से इन्कार करते हुए यह टिप्पणी की।
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याचिका में केंद्र और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को यह निर्देश देने का आग्रह किया गया था कि बार निकायों का चुनाव लड़ने वालों को किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं होना चाहिए। पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा, ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी राजनीतिक दल के सक्रिय सदस्य को बार निकायों का चुनाव लड़ने से रोकता हो। आप चाहते हैं कि हम कानून बनाएं। क्षमा करें, ऐसा नहीं हो सकता है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि यदि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को राजनीतिक दलों के सक्रिय सदस्य होने की अनुमति दी गई तो वे अपने चुनाव के लिए जोर लगाएंगे। इस पर पीठ ने कहा, अगर बार का कोई पदाधिकारी किसी राजनीतिक विचारधारा का हो तो इसमें गलत क्या है? आप कपिल सिब्बल को एससीबीए (सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन) के अध्यक्ष पद से हटाना चाहते हैं? आप (मनन कुमार) मिश्रा (बिहार से राज्यसभा सदस्य) को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद से हटाना चाहते हैं? जस्टिस सूर्यकांत ने कानूनी विशेषज्ञ राम जेठमलानी के योगदान का भी उल्लेख किया।
क्या आप चाहते हैं कि देश बहुमुखी व्यक्ति के योगदान से वंचित रह जाए
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि दिवंगत दिग्गज जेठमलानी ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष का पद संभाला था और एससीबीए के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था। वह संसद में भी रहे और विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े रहे। क्या आप चाहते हैं कि देश इन बहुमुखी प्रतिभाशाली व्यक्ति के विचारों और योगदान से वंचित रह जाए? बार निकाय समाज के विशिष्ट सदस्यों का एक समूह है। हमें नहीं लगता कि राजनीतिक पार्टियों के साथ जुड़ने से कोई असर पड़ेगा। अदालत के मूड को भांपते हुए, सिराजुद्दीन ने इस मुद्दे को विधि आयोग को सौंपने का निर्देश देने की मांग की, लेकिन पीठ ने कहा कि वह ऐसा कोई निर्देश पारित नहीं करने जा रही है और याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।