सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गर्भपात कानून के संबंध में दायर एक याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। याचिका में गर्भपात की 20 हफ्तें के कानूनी सीमा की संवैधानिकता पर सवाल खडे किए गए हैं। याचिका कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें डाउन सिंड्रोम के लक्षण के कारण महिला को गर्भपात कराने की इजाजात नहीं दी गई।
कोर्ट ने संबंधित मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए फैसला सुनाया जिसमें कहा गया था कि 37 वर्ष की अवस्था में महिला को गर्भधारण में शारीरिक जोखिम नहीं उठाना पड़ता। भारत में मौजूदा कानून के तहत 20 हफ्ते के बाद गर्भपात को गैरकानूनी माना गया है। गुरुवार को कोर्ट ने कहा कि देश में कई महत्वपूर्ण मामले लंबित पड़े हैं। इन मामलों पर गर्मियों की छुट्टी के बाद ही सुनवाई हो सकेगी।
याचिका में महिला ने कहा था कि डाउन सिंड्रोम बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकार का कारण है। इस कारण बच्चा एक सामान्य जिंदगी नहीं जी सकेगा। जिसके जवाब में कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 37 वर्ष की महिला को गर्भधारण करने में कोई शारीरिक जोखिम नहीं है। हालांकि डाउन सिंड्रोम के कारण बच्चे कम बुद्धिमान होते हैं, लेकिन वे फिर भी एक सामान्य जिंदगी जी सकते हैं।