सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस याचिका का नए सिरे से परीक्षण करने का निर्णय लिया, जिसमें शीर्ष अदालत से हिरासत में दी जाने वाली यातना व अमानवीय व्यवहार पर रोक के लिए सरकार को कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की मांग है कि हिरासत में यातना के खिलाफ भारत ने संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए हुए हैं, इसलिए इसे गैरकानूनी घोषित किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत इस पर 22 जनवरी को सुनवाई करेगी।
शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर एक साल से भी अधिक समय बाद दोबारा गौर करने का निर्णय लिया है, क्योंकि उसे बताया गया कि इस मामले में सरकार की तरफ से पूर्ण गंभीरता बरते जाने का आश्वासन दिए जाने के बावजूद कानूनी प्रावधान किए जाने की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है। बता दें कि पूर्व कानून मंत्री व कांग्रेस नेता अश्विनी कुमार ने 2016 में याचिका दाखिल की थी, जिसे शीर्ष अदालत ने 27 नवंबर, 2017 को निस्तारित कर दिया था। लेकिन इस मामले में तब से सरकार द्वारा कोई कदम नहीं उठाए जाने के चलते अश्विनी कुमार ने दोबारा अदालत का रुख किया था।
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मंगलवार को जब यह मामला सुनवाई के लिए आया तो एडिशनल सालिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने सरकार का पक्ष रखा। आनंद ने कहा कि कानून बनाने के लिए कुछ और समय चाहिए, क्योंकि ड्राफ्ट बिल राज्य सरकारों की सहमति के लिए भेजा गया है।
2010 में लोकसभा में पारित हुआ था कानून, राज्यसभा में अटका
पीठ के पूछने पर राज्य सभा सांसद अश्विनी कुमार ने भी इससे सहमति जताई और कहा कि बिल संसद की सलेक्ट कमेटी के सामने है। उन्होंने बताया कि लोकसभा ने 2010 में इस बिल को मंजूरी दे दी थी, लेकिन राज्य सभा ने इसे सलेक्ट कमेटी में भेज दिया। इसके बाद वर्तमान एनडीए सरकार ने इस मामले में कुछ नहीं किया, जबकि सरकार की तरफ से संसद में खुद स्वीकार किया गया था कि देश में रोजाना हिरासत में 5 मौत दर्ज की जाती हैं। इसके बाद पीठ ने मामले को 22 जनवरी के लिए लिस्ट करने का आदेश दे दिया।