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Supreme Court: कैशलेस इलाज योजना में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र को लगाई फटकार; मांगा स्पष्टीकरण

Wed, 09 Apr 2025 04:25 PM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

देशभर में बढ़ते सड़क दुर्घटना को देखते हुए बीते 8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि मोटर दुर्घटना पीड़ितों के लिए कैशलेस चिकित्सा उपचार की योजना तैयार की जाए। अब इस योजना की शुरुआत में देरी होने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र फटकार लगाई है। साथ ही सड़क परिवहन मंत्रालय को देरी को लेकर स्पष्टीकरण देने के लिए तलब किया।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : PTI
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विस्तार
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मोटर दुर्घटना पीड़ितों के लिए कैशलेस चिकित्सा उपचार में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई है। साथ ही अदालत ने सड़क परिवहन मंत्रालय के सचिव को वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए स्पष्टीकरण देने के लिए तलब किया। मामले में सुनावई के दौरान जस्टिस अभय एस ओका और उज्जल भुइयां की पीठ ने इस बात पर आपत्ति जताई कि 8 जनवरी के आदेश के बावजूद केंद्र सरकार ने इसका अनुपालन नहीं किया।

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आदेश के बावजूद योजना नहीं हुई लागू
कोर्ट ने आगे कहा कि 8 जनवरी को दिए गए आदेश के बावजूद केंद्र ने योजना को लागू नहीं किया, जो कि एक गंभीर उल्लंघन है। सुनवाई के दौरान जस्टिस अभय एस ओका और उज्जल भुइयां की पीठ ने इस पर आपत्ति जताई। साथ ही कहा कि यह न केवल अदालत के आदेश का उल्लंघन है, बल्कि एक लाभकारी कानून को लागू करने में भी देरी हो रही है।

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मंत्रालय को 28 अप्रैल तक देना होगा स्पष्टीकरण
अदालत ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी से कहा कि यह उनका खुद का कानून है और यदि योजना लागू नहीं की जाती तो लोग अपनी जान गंवा सकते हैं। कोर्ट ने सड़क परिवहन मंत्रालय के सचिव को 28 अप्रैल को स्पष्टीकरण देने के लिए बुलाया।

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8 जनवरी को कोर्ट ने दिया था आदेश

बता दें कि बीते 8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया था कि मोटर दुर्घटना पीड़ितों के लिए कैशलेस चिकित्सा उपचार की योजना तैयार की जाए, ताकि गोल्डन ऑवर में त्वरित चिकित्सा सुविधा मिल सके। कोर्ट ने सरकार से 14 मार्च तक यह योजना उपलब्ध कराने को कहा था। गोल्डन ऑवर वह समय होता है, जब दुर्घटना के बाद एक घंटे के भीतर चिकित्सा सहायता से जान बचाई जा सकती है।

न्यायालय में अवमानना का सामना कर रहे ब्यूरोक्रेट्स की याचिका पर कर्नाटक ट्रस्ट को नोटिस
कर्नाटक के शीर्ष ब्यूरोक्रेट्स ने 2017 के एक फैसले का पालन नहीं करने के आरोप में उच्च न्यायालय द्वारा उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। इस फैसले में उन्हें बेंगलुरु के बाहरी इलाके में स्थित जमनालाल बजाज सेवा ट्रस्ट को 350 एकड़ से अधिक भूमि वापस करने का आदेश दिया गया था। बुधवार को न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कर्नाटक के प्रधान सचिव मंजूनाथ प्रसाद और अन्य आठ नौकरशाहों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की दलीलें सुनीं। सिब्बल ने कहा कि राज्य सरकार ने पहले ही अनुपालन हलफनामा दाखिल कर दिया है, फिर भी अधिकारी अवमानना का सामना कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंस्ट को भेजा नोटिस
सुप्रीम  कोर्ट ने उनकी दलील पर ध्यान दिया और ट्रस्ट को नोटिस जारी किया, क्योंकि राज्य के भूमि अधिकारियों ने ट्रस्ट की भूमि पर कब्जा कर लिया था, यह कहते हुए कि ट्रस्ट के पास कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम, 1961 के तहत अतिरिक्त भूमि है।

दुष्कर्म की कोशिश मामले में पीड़िता की मां का नाम हटाया जाए : सुप्रीम कोर्ट
 सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को दुष्कर्म के प्रयास के मामले में शिकायतकर्ता मां का नाम रिकॉर्ड से हटाने का निर्देश दिया। इस मामले में हाईकोर्ट ने 17 मार्च के फैसले में विवादास्पद टिप्पणियां की थीं। स्वत: संज्ञान लेते हुए शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।

जस्टिस बीआर गवई व जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ को एक याचिका पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील एचएस फुल्का ने बताया कि हाईकोर्ट ने आदेश में पीड़िता की मां के नाम का जिक्र किया है, जो शिकायतकर्ता है। उन्होंने इस याचिका पर स्वत: संज्ञान याचिका के साथ सुनवाई करने की अपील की, जिस पर 15 अप्रैल को सुनवाई होनी है। पीठ ने इसे स्वीकार कर लिया।  
 

आर्थिक अपराधों को गंभीरता से लिया जाए
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्थिक अपराध एक अलग श्रेणी है, जिसमें गहरी साजिशें रची जाती हैं। इसमें सार्वजनिक धन की भारी हानि होती है, इसलिए इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने 9,000 करोड़ रुपये के आदर्श क्रेडिट सहकारी सोसाइटी घोटाले में आरोपियों की अग्रिम जमानत रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने कहा कि अग्रिम जमानत देना निश्चित रूप से नियम नहीं है। जो आरोपी लगातार अदालत में उपस्थित न होकर कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करने से बचते हैं और कार्यवाही को पटरी से उतारने के लिए खुद को छिपाते हैं, वे अग्रिम जमानत के हकदार नहीं हैं। पीठ ने गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) की 16 अपीलों को मंजूरी दी गई, जिसमें आरोपियों के अग्रिम जमानत को चुनौती दी गई थी। पीठ ने कहा कि आर्थिक अपराध गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं जो पूरे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं और इस प्रकार देश के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं। 

निष्पक्ष सुनवाई राज्य का कर्तव्य, कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती के आरोपों की बेहतर जांच के दिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है। अदालत ने एक मामले में गवाहों पर दबाव डालने के कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती के आरोपों की बेहतर जांच का निर्देश दिया। जस्टिस अभय एस. ओका व जस्टिस उज्ज्ल भुइयां की पीठ ने भारती के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की दलीलों पर संज्ञान लिया। सिब्बल ने दावा किया था कि मामले में बचाव पक्ष के गवाहों को धमकी देने का प्रयास किया गया था। 

पीठ ने कहा, हमने पाया कि राज्य की तरफ से नियुक्त अधिकारियों ने बचाव पक्ष के गवाहों पर दबाव डालने के संबंध में याचिकाकर्ता के आरोपों की सही से जांच नहीं की। हमें उम्मीद थी कि अधिकारी याचिकाकर्ता व गवाहों की तरफ से लगाए गए सभी आरोपों की जांच करेंगे।

डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों के सुरक्षा मानकों में संशोधन के मांगे सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों के सुरक्षा मानकों में संशोधन के लिए केंद्र की ओर से गठित विशेषज्ञ समिति से तीन महीने में सुझाव देने का निर्देश दिया है। इन मानदंडों के तहत डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों के बारे में कंटेनर या रैपर पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदर्शित करना अनिवार्य बनाया जाना है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि समिति से रिपोर्ट मिलने के बाद केंद्र को जल्द से जल्द खाद्य सुरक्षा और मानक (लेबलिंग और डिस्प्ले) विनियम, 2020 में संशोधन पर फैसला लेना चाहिए। पीठ खाद्य पदार्थ के डिब्बे पर सामने की तरफ चीनी, नमक, संतृप्त वसा और अन्य सामग्री की मात्रा प्रदर्शित करने और उसके अनुसार लेबल प्रदर्शित करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने मजाकिया अंदाज में कहा, आपके नाती-नातिन हैं। उन्हें इस याचिका पर फैसला करने दीजिए। आपको पता चल जाएगा कि कुरकुरे और मैगी क्या हैं और उनके रैपर कैसे होने चाहिए। पैकेट पर कोई जानकारी नहीं होती है।  

न्यायालय ने केंद्र को एक विशेषज्ञ समिति बनाने और सिफारिशों की एक सूची तैयार करने और तीन महीने के भीतर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, ताकि उस आधार पर आवश्यक संशोधन किए जा सकें।

शीर्ष अदालत ने केंद्र और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की ओर से इसी मुद्दे पर नियमों में संशोधन का प्रस्ताव करते हुए दायर जवाब पर संज्ञान लिया। इसमें बताया गया कि केंद्र को जनता से लगभग 14,000 आपत्तियां और सुझाव प्राप्त हुए हैं। उनकी जांच करने और खाद्य एवं सुरक्षा मानक (लेबलिंग और प्रदर्शन) विनियम, 2020 में बदलाव की सिफारिश करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस पर पीठ ने याचिका निपटारा करते हुए कहा कि विशेषज्ञ समिति तीन महीने के भीतर शीघ्रता से अपनी सिफारिशें दे।

निजी नियोक्ता रोजगार संबंधी विवादों के लिए चुन सकते कोर्ट
 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजी नियोक्ता, कर्मचारियों के सेवा अनुबंध पत्र में यह प्रावधान डाल सकते हैं कि नौकरी से संबंधित विवादों का निपटारा किसी खास कोर्ट या न्यायक्षेत्र में ही होगा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा, निजी नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच का अनुबंध कानूनी रूप से बाद्यकारी समझौता होता है फिर चाहे उसके पक्षकार कोई भी हों या उनकी संख्या कुछ भी हो। पीठ ने हालांकि कहा, कानूनी निर्णय का अधिकार किसी भी पक्ष की ओर से अनुबंध के माध्यम से नहीं छीना जा सकता है, बल्कि पक्षों की सुविधा के लिए इसे कुछ न्यायालयों को सौंपा जा सकता है।  
 
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ईवी पर व्यापक प्रस्ताव पेश करे केंद्र
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार को सरकारी विभागों में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को शामिल करने के संबंध में 30 अप्रैल तक एक व्यापक प्रस्ताव पेश करने का निर्देश दिया। इस पहल का उद्देश्य विशेष रूप से महानगरीय क्षेत्रों में प्रदूषण की बढ़ती समस्या को संबोधित करना है। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइंया की पीठ ने बदलाव की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। कोर्ट ने प्रदूषण फैलाने वाले पुराने भारी वाहनों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी अप्रैल के अंत तक प्रस्ताव पेश करने का निर्देश दिया।  
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