सुप्रीम कोर्ट ने छह साल की बच्ची की हत्या और दुष्कर्म के दोषी की सजा पर रोक लगा दी है और उसे रिहा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जांच में कई गलतियों और लापरवाही की गई, जिसके चलते इस बर्बर कांड के आरोपी को राहत मिली। कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस की जांच पर सवाल उठाए और कहा कि जांच में कई गलतियां की गई थी, जिससे अपराध को साबित नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने की ये टिप्पणी
बता दें कि आरोपी ने अक्तूबर 2015 में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी। जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने फैसले में आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया। पीठ ने कहा कि बच्ची के साथ जो अपराध हुआ, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और इसकी वजह से एक जीवन तबाह हो गया। बच्ची के माता-पिता के दुख का भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता और यह एक एक घाव है, जिसकी कोई दवा नहीं है। पीठ ने कहा कि इस कड़वी सच्चाई के साथ हमें ये भी ध्यान रखना है कि जांच में कई खामियां हैं और यह अपराध साबित भी नहीं हुआ है।
क्या है मामला
बता दें कि जून 2010 में महाराष्ट्र के ठाणे में बच्ची की दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी। हत्या के बाद बच्ची के शव को नाले में फेंक दिया गया था। नवंबर 2014 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने आरोपी को रिहा करते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य सबूतों को देखकर युवक को दोषी ठहरा दिया गया लेकिन एक भी चश्मदीद गवाह नहीं मिला, जिसने अपराध होते हुए देखा हो। सजा अपराध स्वीकार करने के आधार पर सुनाई गई है लेकिन उसके खिलाफ वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं। जांच के दौरान बार-बार जांच अधिकारी के बदलने पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए। सैंपल जांच के लिए भेजने में काफी देरी हुई।