नौकरशाह कानून से ऊपर नहीं: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट उस जनहित याचिका पर सुनवाई को तैयार हो गया है, जिसमें 10 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के गर्भ में पल रहे 26 हफ्ते के बच्चे को गिराने की इजाजत मांगी गई है। सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सोमवार को सुनवाई करेगा। चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने वकील अलख आलोक श्रीवास्तव की जल्द सुनवाई की याचिका मंजूर कर लिया है। याची ने शुक्रवार को इस मामले पर जल्द सुनवाई की गुहार लगाई थी।
याचिका में कहा गया है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और विधि मंत्रालय को एम्स के डॉक्टरों का पैनल गठित करने का निर्देश दिया जाए। इससे 26 हफ्ते के गर्भ को सुरक्षित तरीके से गिराया जा सकेगा। इससे पहले चंडीगढ़ की जिला अदालत ने 18 जुलाई को गर्भपात की इजाजत देने से इनकार कर दिया था। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इस तरह के मामलों के लिए उचित दिशानिर्देश बनाने की भी मांग की गई है।
याचिका में कहा गया कि चिकित्सा विशेषज्ञों ने साफ तौर पर राय दी है कि अगर 10 वर्षीय बलात्कार पीड़िता को बच्चे को जन्म देने के लिए बाध्य किया जाता है तो यह पीड़िता और बच्चे के लिए घातक हो सकता है। केंद्र सरकार को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट, 1971 की धारा-तीन में संशोधन करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
मौजूदा प्रावधान मुताबिक गर्भधारण के 20 हफ्ते के बाद गर्भपात की इजाजत नहीं दी जा सकती। लेकिन अधिनियम की धारा-पांच में यह प्रावधान है कि अगर गर्भ के कारण महिला की जान को खतरा हो तो 20 हफ्ते के बाद महिला को गर्भपात कराने की इजाजत दी जा सकती है।