सीमावर्ती इलाकों के दुर्गम पहाडिय़ों पर सेना के लिए हथियार, राशन, अस्त्र-शस्त्र आदि ढोने वाले कुलियों (आर्मी पोर्टर) को सुप्रीम कोर्ट ने सेना की रीढ़ की हड्डी करार दिया है।
शीर्ष अदालत ने यह सवाल उठाया है कि आर्मी पोर्टर को आखिर स्थायी कर्मचारियों के समान वेतन क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्यों नहीं इन लोगों को एक सिपाही को मिलने वाली सुविधाएं दी जानी चाहिए?
चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने आर्मी पोर्टरों के साथ हो रहे भेदभाव पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिरकार सरकार उनके साथ ऐसा क्यों कर रही है। पीठ ने कहा कि आर्मी पोर्टर सेना के लिए रीढ़ की हड्डी है। इतना ही नहीं पोर्टर सेना की लाइफ लाइन है।
चीफ जस्टिस ने कहा कि केंद्र सरकार आर्मी पोर्टरों की उपयोगिता को समझ नहीं पा रही है। उन्हें विषम परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। ऐसे में उन्हें स्थायी कर्मियों के समान वेतन क्यों नहीं मिलना चाहिए।