इंटरनेट इस्तेमाल के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार अनुच्छेद 19 का जिक्र किया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2017 में एक फैसले में कहा था कि इंटरनेट का इस्तेमाल नागरिकों का हक है। गर्भ में लिंग परीक्षण के विज्ञापनों को बैन कर देने से इंटरनेट इस्तेमाल के अधिकारों में कटौती नहीं होती। वहीं, केरल हाईकोर्ट ने सितंबर 2019 में 18 साल की छात्रा की याचिका पर कहा था कि इंटरनेट इस्तेमाल को मौलिक अधिकार में शामिल बताया था।
चार्ल्स डिकंस की पंक्तियों से की फैसले की शुरुआत
पीठ ने अपने फैसले की शुरुआत 19वीं सदी के ब्रिटिश लेखक चार्ल्स डिकंस के उपन्यास ‘ए टेल ऑफ टू सिटीज’ की चंद पंक्तियों से की। जिसका मजमून कुछ यूं है...
यह सबसे शानदार समय था और सबसे खराब वक्त भी
कई बार, यह ज्ञान का युग था, यह मूर्खता का भी युग
यह विश्वास का युग था, यह अविश्वास का भी युग
यह उजाले का भी मौसम था, और अंधेरे का भी
यह उम्मीदों का वसंत था और निराशा की सर्दिया
हमारे सामने सब कुछ था और कुछ भी नहीं था,
हम सीधे स्वर्ग जा रहे थे, हम दूसरे रास्ते से भी जा रहे थे
यह वक्त अपने वर्तमान से काफी दूर था
अब कोलाहलपूर्ण वक्त में जीने के लिए मजबूर
अच्छा हो या बुरा, जो भी है अति है।
बीते साल केंद्र सरकार ने 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट सेवाओं के साथ टेलीफोन सेवाओं और अन्य संचार माध्यमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके अलावा अन्य पाबंदियां भी लगाई गई थी। इन पाबंदियों के खिलाफ कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन समेत कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
पीठ की अहम टिप्पणी
- इंटरनेट बैन पर आदेशों की बीच-बीच में समीक्षा की जानी चाहिए
- बिना वजह इंटरनेट पर बैन नहीं लगाया जा सकता
- इंटरनेट पर पूरा बैन सख्त कदम, जरूरी होने पर लगे
- चिकित्सा समेत सभी जरूरी सेवाओं में इंटरनेट को बहाल किया जाए
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस दावे को खारिज कर दिया कि गत वर्ष अगस्त से जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा संचार व आने-जाने पर लगाई गई पाबंदी से मीडिया पर चिलिंग इफेक्ट (मीडिया के प्रभावी तरीके से काम करने पर असर) हो रहा है। जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा, बिना किसी साक्ष्य को रिकार्ड पर लगाए यह समझना असंभव है कि चिलिंग इफेक्ट पड़ने का वैधानिक दावा सही है। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए महज भावनात्मक दलीलों से यह दावा करना सही नहीं है।
हालांकि कोर्ट ने कहा कि जिम्मेदार सरकार के लिए हर वक्त मीडिया को आजादी देने और पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने में सहायता करने की जरूरत है। वास्तव में कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने कश्मीर में इंटरनेट व अन्य संचार माध्यम पर लगाई पाबंदियों की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इससे प्रेस की आजादी प्रभावित हो रही है।