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Supreme Court: 'धर्मांतरण करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त होगा', सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

Tue, 24 Mar 2026 11:35 AM IST
Nitin Gautam न्यूज डेस्क, अमर उजाला।

सार

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि धर्मांतरण करने वाला व्यक्ति एससी-एसटी कानून के प्रावधानों का पात्र नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा है। आइए जानते हैं कि ये पूरा मामला क्या है?
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धर्मांतरण मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में कहा कि धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का दर्जा पूरी तरह से खो देता है। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अगर कोई व्यक्ति उदाहरण के लिए ईसाई धर्म अपना लेता है और ईसाई धर्म के अनुसार जीवन जी रहा है तो उसे अनुसूचित जाति का व्यक्ति नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि हिंदू धर्म, सिख धर्म और बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। 
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क्या है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा सांविधानिक आदेश, 1950 में  साफ कहा गया है कि खंड-3 में बताए गए धर्मों के अलावा किसी भी धर्म में धर्मांतरण करने पर जन्म के बावजूद, अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है। 
यह आदेश एक ऐसे व्यक्ति के मामले में दिया गया, जिसने ईसाई धर्म अपना लिया था और अब पेस्टर के तौर पर काम कर रहा है, लेकिन उसने कुछ लोगों के खिलाफ एससी-एसटी (अत्याचार रोकथाम) कानून के तहत मामला दर्ज कराया था। मामला दर्ज कराने वाले व्यक्ति ने एससी-एसटी कानून के तहत संरक्षण की मांग की थी। हालांकि जिन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया, उन्होंने इसे चुनौती दी और दावा किया कि पीड़ित ईसाई धर्म अपना चुका है। 
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हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट की धाराओं को हटाने का आदेश दिया
30 अप्रैल 2025 को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं है। ऐसे में पीड़ित व्यक्ति एससी-एसटी कानून के प्रावधानों का लाभ लेने का पात्र नहीं है। इसके बाद हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज धाराओं को खत्म करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ पेस्टर ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन दायर की। 

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा 'इस मामले में ये अहम नहीं है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म से अपने मूल धर्म में धर्मांतरित हो गया है या उसे उसके मूल समुदाय द्वारा स्वीकार किया गया है या नहीं। बल्कि सबूतों से ये सिद्ध होता है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म का पालन करता है और एक दशक से अधिक समय से बतौर पादरी काम कर रहा है। वह गांव के घरों में नियमित तौर पर रविवार की प्रार्थनाएं आयोजित करता है। इस तथ्यों से इस बात में कोई शक नहीं है कि घटना के समय वह ईसाई बना रहा।'



 
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