याचिकाकर्ताओं ने फौज में कार्यरत महिलाओं का दर्द जाहिर किया। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन नहीं दिया गया क्योंकि सेना में 96 प्रतिशत होने के बावजूद पुरुष अधिकारियों के एक वर्ग को डर है कि उच्च अधिकारियों के खाली पदों पर महिलाओं का कब्जा हो जाएगा। 322 योग्य महिला अधिकारियों को हटाकर पुरुष अधिकारियों को प्रमोट किया गया। 20-20 साल सेना में काम करने के बावजूद वे ऐसी मानसिकता से लड़ रही हैं।
युद्ध भूमि के हालात
14 साल की सेवा के दौरान सेना महिलाओं को प्रभावशाली कार्यशक्ति तो मानती है, उनके काम पुरुष अधिकारियों के जैसे ही होते हैं। लेकिन केंद्र सरकार युद्ध भूमि में अलग हालात होने का तर्क दे रही है, इसका कोई आधार नहीं है।
महिला अधिकारी को समान मानने का समय
महिलाओं की मौजूदगी से सेना की यूनिट की एकजुटता पर प्रतिकूल असर होगा, केंद्र सरकार का ऐसा तर्क है। लेकिन यह समय महिला अधिकारियों को समान सहकर्मी के रूप में स्वीकार करने का है।
राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क, लेकिन संवेदनशील जगहों पर दी नियुक्ति
तर्क भी नहीं मान सकते कि महिलाओं को संवेदनशील नियुक्ति नहीं दी जा सकती लेकिन महिला अधिकारियों को संवेदनशील पदों, जगहों, हैडक्वार्टर्स और यूनिट में तैनाती दी गई है।
- सैन्य सेवा एक जीवन शैली है जिसमें त्याग, समर्पण और कॉल ऑफ ड्यूटी से आगे बढ़कर योगदान की जरूरत होती है।
- महिलाओं को गर्भावस्था, मातृत्व, बच्चों व परिवार प्रति जिम्मेदारियों से जूझना होता है, यह सैनिक के जीवन के अनुकूल नहीं है।
- एक सैनिक में लड़ाई के लिए शारीरिक क्षमताएं होनी चाहिए।
- पुरुषों के अनुकूल यूनिट के माहौल में महिला अधिकारी होने पर व्यवहार को संयमित करना पड़ेगा।
- महिलाओं में शारीरिक सीमाएं मातृत्व, बच्चों को पालने और घर में रहने की वजह से होती है।
- महिला अधिकारियों को ऐसी जगह कैसे लगाया जाए जहां सेना को बहुत कम संसाधनों में रहना पड़ता है?
सुप्रीम टिप्पणी : आपके तर्क लकीर के फकीर जैसे
- कोर्ट ने कहा, उपनिवेशकाल खत्म हुए और हमें आजाद हुए 70 साल हो चुके, लेकिन जिस तरह के तर्क दिए गए हैं, उससे लगता है कि अब भी हमारे दृष्टिकोण और मानसिकता बदली नहीं है। यह तर्क लकीर के फकीर जैसे हैं।
- महिलाओं को गर्भावस्था, मातृत्व, घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से सैन्य सेवा में ज्यादा चुनौतियां पेश आ सकती हैं, यह उस मानसिकता से उपजा तर्क है जो मानता है कि महिलाएं केवल घरेलू काम करने के लिए हैं।
- महिला अधिकारियों के होने से यूनिट के माहौल पर प्रतिकूल असर होगा, इस तर्क को महिलाओं को अलग रखने का आधार बनाया जा रहा है। कम संसाधनों में महिला अधिकारियों को परेशानी का तर्क यह बताने के लिए दिया गया कि उन्हें हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में नियुक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन याचिका में यह भी सामने आया कि 30 प्रतिशत महिला अधिकारी ऐसे ही क्षेत्रों में नियुक्त हैं।
महिलाओं को कमान में नियुक्ति न देना और केवल स्टाफ अपॉइंटमेंट तक सीमित रखना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। समानता के अधिकार में दो वर्गों के प्रति अतार्किक और गैर-वाजिब भेदभाव नहीं झलकना चाहिए।
- जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अजय रस्तोगी