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स्थायी कमीशन : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, महिलाओं को कमजोर कहना संविधान के खिलाफ

Tue, 18 Feb 2020 03:33 AM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘समानता के अधिकार में सरकार के कामों में दो वर्गों के लोगों के प्रति अतार्किक और गैर-वाजिब भेदभाव नहीं झलकना चाहिए।’ आगे इसे समझाया कि समानता का अधिकार तार्किकता का अधिकार भी है।
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विस्तार
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भारतीय सेना की महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों को पुरुष सैन्य अधिकारियों के समान स्थायी कमीशन के लिए योग्य करार देते हुए मील का पत्थर साबित होने वाले निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं को कमजोर मानना भारतीय संविधान के मूल्यों के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें कमान में नियुक्ति नहीं देना और केवल स्टाफ अपॉइंटमेंट तक सीमित रखना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद सभी नागरिकों को समानता का अधिकार है। 

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘समानता के अधिकार में सरकार के कामों में दो वर्गों के लोगों के प्रति अतार्किक और गैर-वाजिब भेदभाव नहीं झलकना चाहिए।’ आगे इसे समझाया कि समानता का अधिकार तार्किकता का अधिकार भी है। इस मामले में सरकार के अंग के रूप में सेना ने महिला और पुरुष के बीच भेदभाव किया है, जिसकी तार्किकता उसे साबित करनी होगी। लेकिन मौजूदा मामले में सेना ने इसका कोई औचित्यपूर्ण जवाब नहीं दिया कि महिला अधिकारी के नाम पर कमान में नियुक्ति के लिए विचार क्यों नहीं किया जाता है? 

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर महिला अधिकारियों को केवल स्टाफ नियुक्तियों तक सीमित रखा जाएगा तो उन्हें स्थायी कमीशन देने का कोई मतलब नहीं है। वे करिअर में आगे नहीं बढ़ सकेंगी। कोई अधिकारी कमान में नियुक्ति के योग्य है या नहीं, इसका निर्णय सक्षम प्राधिकारी द्वारा लिया जाना चाहिए, इसमें सेवा की स्थितियों, प्रदर्शन, संगठन की जरूरत को देखना चाहिए। पुरुष अधिकारी को ऑटोमेटिक रूप से नियुक्त नहीं किया जा सकता।
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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने सेना में सेवारत महिला अधिकारियों के साथ नाइंसाफी का मुद्दा उठाते हुए कहा, पुरुष एसएससीओ को पांच व 10 साल सेवाकाल के बार स्थायी कमीशन का विकल्प दिया जाता है, महिला अधिकारियों को नहीं, भले ही वे 25 साल सेवा कर लें।’ इसी प्रकार के कई तर्क महिला सैन्य अधिकारियों व याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में रखे गए।

सुप्रीम कोर्ट में महिला अफसरों का प्रतिनिधित्व कर रही वकीलों मीनाक्षी लेखी और ऐश्वर्या भाटी ने कहा, कई महिलाओं ने विपरीत परिस्थितियों में असाधारण साहस का प्रदर्शन किया है। दूसरी तरफ महिलाओं को कमान में तैनाती के खिलाफ दलील दी गई कि सेना में कठिन हालात का सामना करना पड़ता है। जिसे महिलाएं झेल पाने में कई बार समर्थ नहीं होतीं।

खाली पदों पर महिलाओं के आने का डर : याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ताओं ने फौज में कार्यरत महिलाओं का दर्द जाहिर किया। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन नहीं दिया गया क्योंकि सेना में 96 प्रतिशत होने के बावजूद पुरुष अधिकारियों के एक वर्ग को डर है कि उच्च अधिकारियों के खाली पदों पर महिलाओं का कब्जा हो जाएगा। 322 योग्य महिला अधिकारियों को हटाकर पुरुष अधिकारियों को प्रमोट किया गया। 20-20 साल सेना में काम करने के बावजूद वे ऐसी मानसिकता से लड़ रही हैं।

युद्ध भूमि के हालात

14 साल की सेवा के दौरान सेना महिलाओं को प्रभावशाली कार्यशक्ति तो मानती है, उनके काम पुरुष अधिकारियों के जैसे ही होते हैं। लेकिन केंद्र सरकार युद्ध भूमि में अलग हालात होने का तर्क दे रही है, इसका कोई आधार नहीं है।

महिला अधिकारी को समान मानने का समय

महिलाओं की मौजूदगी से सेना की यूनिट की एकजुटता पर प्रतिकूल असर होगा, केंद्र सरकार का ऐसा तर्क है। लेकिन यह समय महिला अधिकारियों को समान सहकर्मी के रूप में स्वीकार करने का है।

राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क, लेकिन संवेदनशील जगहों पर दी नियुक्ति

तर्क भी नहीं मान सकते कि महिलाओं को संवेदनशील नियुक्ति नहीं दी जा सकती लेकिन महिला अधिकारियों को संवेदनशील पदों, जगहों, हैडक्वार्टर्स और यूनिट में तैनाती दी गई है।

सेना : गिनाए कठिन हालात

  • सैन्य सेवा एक जीवन शैली है जिसमें त्याग, समर्पण और कॉल ऑफ ड्यूटी से आगे बढ़कर योगदान की जरूरत होती है।
  • महिलाओं को गर्भावस्था, मातृत्व, बच्चों व परिवार प्रति जिम्मेदारियों से जूझना होता है, यह सैनिक के जीवन के अनुकूल नहीं है।
  • एक सैनिक में लड़ाई के लिए शारीरिक क्षमताएं होनी चाहिए।
  • पुरुषों के अनुकूल यूनिट के माहौल में महिला अधिकारी होने पर व्यवहार को संयमित करना पड़ेगा।
  • महिलाओं में शारीरिक सीमाएं मातृत्व, बच्चों को पालने और घर में रहने की वजह से होती है।
  • महिला अधिकारियों को ऐसी जगह कैसे लगाया जाए जहां सेना को बहुत कम संसाधनों में रहना पड़ता है?

सुप्रीम टिप्पणी : आपके तर्क लकीर के फकीर जैसे

  • कोर्ट ने कहा, उपनिवेशकाल खत्म हुए और हमें आजाद हुए 70 साल हो चुके, लेकिन जिस तरह के तर्क दिए गए हैं, उससे लगता है कि अब भी हमारे दृष्टिकोण और मानसिकता बदली नहीं है। यह तर्क लकीर के फकीर जैसे हैं।
  • महिलाओं को गर्भावस्था, मातृत्व, घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से सैन्य सेवा में ज्यादा चुनौतियां पेश आ सकती हैं, यह उस मानसिकता से उपजा तर्क है जो मानता है कि महिलाएं केवल घरेलू काम करने के लिए हैं।
  • महिला अधिकारियों के होने से यूनिट के माहौल पर प्रतिकूल असर होगा, इस तर्क को महिलाओं को अलग रखने का आधार बनाया जा रहा है। कम संसाधनों में महिला अधिकारियों को परेशानी का तर्क यह बताने के लिए दिया गया कि उन्हें हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में नियुक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन याचिका में यह भी सामने आया कि 30 प्रतिशत महिला अधिकारी ऐसे ही क्षेत्रों में नियुक्त हैं।

महिलाओं को कमान में नियुक्ति न देना और केवल स्टाफ अपॉइंटमेंट तक सीमित रखना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। समानता के अधिकार में दो वर्गों के प्रति अतार्किक और गैर-वाजिब भेदभाव नहीं झलकना चाहिए। 
- जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अजय रस्तोगी

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फैसले में इन महिला अफसरों को माना काबिल-ए-मिसाल

  • लेफ्टिनेंट कर्नल सोफिया कुरैशी : सेना की सिग्नल कोर की ले. कर्नल सोफिया कुरैशी ने कई देशों के सबसे बड़े मिले-जुले युद्धाभ्यास ‘एक्सरसाइज फोर्स 18’ में भारत का नेतृत्व किया। वे 2006 में कांगो में संयुक्त राष्ट्र के शांति के लिए हुए सैन्य ऑपरेशन में सेवा दे चुकी हैं।
  • ले. कर्नल अनुवंदना जग्गी : संयुक्त राष्ट्र के सैन्य पर्यवेक्षकों की टीम का नेतृत्व करते हुए वे पूर्वी अफ्रीका के बुरुंडी में सेवाएं दे चुकी हैं। इसके लिए यूएन फोर्स कमांडर का सम्मान।
  • मेजर गोपिका भट्टी : 15 सितंबर 2010 को मेजर गोपिका भट्टी ने कॉन्वॉय कमांडर के रूप में जेसीओ, जवानों और सैन्य उपकरणों व हथियारों को 30 से 50 वाहनों में लेह से पठानकोट के बीच ट्रांसपोर्ट करवाया।
  • मेजर मधु राणा, मेजर प्रीति सिंह, मेजर अनुजा यादव : इन तीनों अधिकारियों को कांगो में संयुक्त राष्ट्र की शांतिस्थापना सेना के सदस्य के रूप मेें सेवाएं देने के लिए संयुक्त राष्ट्र मेडल दिया गया।
  • कैप्टन अश्विनी पवार और कैप्टन क्षिप्रा मजूमदार : आर्मी ऑर्डिनेंस कोर की इन दोनों अधिकारियों को 2007 में राष्ट्रपति के हाथों से सेवा मेडल प्रदान किए गए।
  • मेजर भावना कस्तूरी : आर्मी एजूकेशन कोर की मेजर भावना कस्तूरी पुरुषों के सैन्य दल का नेतृत्व करने वाली पहली महिला अधिकारी हैं।
  • कैप्टन तान्या शेरगिल : 15 जनवरी 2020 को कैप्टन तान्या शेरगिल ने पहली परेड एडजुटेंट के रूप में पुरुषों के सैन्य दल का नेतृत्व किया।
  • मेजर गोपिका पवार : मेजर गोपिका अजित सिंह पवार को संयुक्त राष्ट्र ने लेबनान में यूएन की सेना में सेवाएं देने के लिए शांतिस्थापना मेडल प्रदान किया।
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