जमानत पर कानून के उल्लंघन वाले निचली अदालतों के फैसले स्वीकार नहीं हो सकते
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जमानत के मामलों में उसके दिशा निर्देशों और कानून का उल्लंघन करते हुए जारी निचली अदालतों के आदेश को स्वीकार नहीं किया जा सकता। साथ ही संबंधित मजिस्ट्रेटों को न्यायिक कार्य से हटाकर अकादमियों में भेजा जाना चाहिए ताकि उनके कौशल में सुधार हो सके। जस्टिस एसके कौल की पीठ ने पाया कि उसके सामने आए कुछ आदेशों में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का उल्लंघन किया जाता है।
पीठ ने कहा, यह सिर्फ एक नमूना है। जमीनी स्तर पर हालात कैसे होंगे इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि शीर्ष अदालत के फैसलों पर निचली अदालतों ने गौर नहीं किया है। इसके बावजूद ऐसे फैसले सुनाए जा रहे हैं जिसका दोहरा प्रभाव हो। जैसे उन मामलों में लोगों को हिरासत में भेजना जहां उसकी जरूरत नहीं हे और आगे मुकदमेेबाजी को बढ़ाना।
पक्षकारों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करते समय अदालतों का बेहद सतर्क रहना जरूरी
शीर्ष अदालत ने मंगलवार को कहा कि इसमें शामिल पक्षों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करते समय अदालतों को बेहद सतर्क रहना जरूरी है और अदालतों में की गई टिप्पणियों के अब दूरगामी परिणाम होंगे और इससे समाज को भारी नुकसान हो सकता है। बता दें कि अदालतों में अब कार्यवाही के लाइव प्रसारण हो रहे हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि सामान्य रूप से कानूनी प्रणाली और विशेष रूप से न्यायिक प्रणाली ने आभासी सुनवाई और खुली अदालती कार्यवाही के लाइव प्रसारण को अपनाने के कारण पहुंच और पारदर्शिता के एक नए युग की शुरुआत की है।
सुप्रीम कोर्ट ने कानून मंत्रालय से न्यायाधिकरणों के न्यायिक प्रभाव का आकलन करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कानून और न्याय मंत्रालय को 2017 के वित्त अधिनियम में संदर्भित सभी न्यायाधिकरणों के न्यायिक प्रभाव का आकलन जल्द से जल्द करने का निर्देश दिया, जबकि यह देखते हुए कि मंत्रालय ने 2019 के शीर्ष अदालत के निर्देश के बावजूद अभी तक इसका संचालन नहीं किया है।
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने कहा कि रोजर मैथ्यू मामले में 13 नवंबर, 2019 को दिए गए एक फैसले में शीर्ष अदालत ने केंद्र को कुछ न्यायाधिकरणों के न्यायिक प्रभाव का आकलन करने का निर्देश दिया था।