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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा प्रशासनिक ट्रिब्यूनल खत्म करने के फैसले को बताया वैध, कही ये बात

Tue, 21 Mar 2023 01:14 PM IST
हिमांशु मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

संवैधानिक पीठ में शामिल जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने कहा, 'हम मानते हैं कि उड़ीसा प्रशासनिक न्यायाधिकरण (OAT) का उन्मूलन संवैधानिक रूप से मान्य था। अनुच्छेद 323A (प्रशासनिक न्यायाधिकरणों से संबंधित) राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरणों को समाप्त करने के लिए भारत संघ को नहीं रोकता है। न्यायाधिकरण को समाप्त करने का निर्णय अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है।'
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि ओडिशा प्रशासनिक न्यायाधिकरण को समाप्त करना संवैधानिक रूप से वैध है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने ट्रिब्यूनल बार एसोसिएशन के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
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संवैधानिक पीठ में शामिल जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने कहा, 'हम मानते हैं कि उड़ीसा प्रशासनिक न्यायाधिकरण (OAT) का उन्मूलन संवैधानिक रूप से मान्य था। अनुच्छेद 323A (प्रशासनिक न्यायाधिकरणों से संबंधित) राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरणों को समाप्त करने के लिए भारत संघ को नहीं रोकता है। न्यायाधिकरण को समाप्त करने का निर्णय अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है।'

बता दें कि शीर्ष अदालत उड़ीसा प्रशासनिक ट्रिब्यूनल बार एसोसिएशन द्वारा उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने दो अगस्त, 2019 को केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा जारी अधिसूचना को बरकरार रखा था, जिसमें OAT को समाप्त करने का आदेश दिया गया था। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य सरकार के इस विचार का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सामग्री है कि ट्रिब्यूनल ने वादियों को त्वरित न्याय देने के उद्देश्य को पूरा नहीं किया है।
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इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर 11 अप्रैल को होगी सुनवाई 
सुप्रीम कोर्ट ने 11 अप्रैल को सरकार की इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को चुनौती देने वाली याचिका को सुनने का फैसला लिया है। इस याचिका की सुनवाई संविधान पीठ की तरफ से की जाएगी। 

जमानत पर कानून के उल्लंघन वाले निचली अदालतों के फैसले स्वीकार नहीं हो सकते
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जमानत के मामलों में उसके दिशा निर्देशों और कानून का उल्लंघन करते हुए जारी निचली अदालतों के आदेश को स्वीकार नहीं किया जा सकता। साथ ही संबंधित मजिस्ट्रेटों को न्यायिक कार्य से हटाकर अकादमियों में भेजा जाना चाहिए ताकि उनके कौशल में सुधार हो सके। जस्टिस एसके कौल की पीठ ने पाया कि उसके सामने आए कुछ आदेशों में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का उल्लंघन किया जाता है।

पीठ ने कहा, यह सिर्फ एक नमूना है। जमीनी स्तर पर हालात कैसे होंगे इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि शीर्ष अदालत के फैसलों पर निचली अदालतों ने गौर नहीं किया है। इसके बावजूद ऐसे फैसले सुनाए जा रहे हैं जिसका दोहरा प्रभाव हो। जैसे उन मामलों में लोगों को हिरासत में भेजना जहां उसकी जरूरत नहीं हे और आगे मुकदमेेबाजी को बढ़ाना।

पक्षकारों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करते समय अदालतों का बेहद सतर्क रहना जरूरी
शीर्ष अदालत ने मंगलवार को कहा कि इसमें शामिल पक्षों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करते समय अदालतों को बेहद सतर्क रहना जरूरी है और अदालतों में की गई टिप्पणियों के अब दूरगामी परिणाम होंगे और इससे समाज को भारी नुकसान हो सकता है। बता दें कि अदालतों में अब कार्यवाही के लाइव प्रसारण हो रहे हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा कि सामान्य रूप से कानूनी प्रणाली और विशेष रूप से न्यायिक प्रणाली ने आभासी सुनवाई और खुली अदालती कार्यवाही के लाइव प्रसारण को अपनाने के कारण पहुंच और पारदर्शिता के एक नए युग की शुरुआत की है।

सुप्रीम कोर्ट ने कानून मंत्रालय से न्यायाधिकरणों के न्यायिक प्रभाव का आकलन करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कानून और न्याय मंत्रालय को 2017 के वित्त अधिनियम में संदर्भित सभी न्यायाधिकरणों के न्यायिक प्रभाव का आकलन जल्द से जल्द करने का निर्देश दिया, जबकि यह देखते हुए कि मंत्रालय ने 2019 के शीर्ष अदालत के निर्देश के बावजूद अभी तक इसका संचालन नहीं किया है।

मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने कहा कि रोजर मैथ्यू मामले में 13 नवंबर, 2019 को दिए गए एक फैसले में शीर्ष अदालत ने केंद्र को कुछ न्यायाधिकरणों के न्यायिक प्रभाव का आकलन करने का निर्देश दिया था।
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आपराधिक मामलों में सांसदों के त्वरित परीक्षण के लिए सर्वग्राही निर्देश पारित नहीं कर सकते
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह सभी उच्च न्यायालयों को यह सुनिश्चित करने के लिए एक सर्वव्यापी आदेश पारित नहीं कर सकता है कि विशेष ट्रायल कोर्ट विशेष रूप से सांसदों से जुड़े आपराधिक मामलों से निपटें और इस तरह के परीक्षणों को पूरा करने से पहले अन्य मामलों को न लें।

मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया की 17वीं रिपोर्ट पर विचार करते हुए यह टिप्पणी की, जो सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के शीघ्र निपटान की मांग वाली एक जनहित याचिका की सुनवाई में सहायता कर रहे हैं। 

पीठ ने कहा कि हम सभी उच्च न्यायालयों को सर्वव्यापी निर्देश कैसे पारित कर सकते हैं? कुछ विशेष अदालतों में सांसदों के खिलाफ लंबित मामलों की संख्या अन्य अदालतों की तुलना में कम हो सकती है।
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