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'एफआईआर में नाम दर्ज न होने का मतलब आरोप से बरी होना नहीं'

Sat, 09 Apr 2016 07:37 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर घटना या वारदात की इनसाइक्लोपीडिया नहीं होती है। संभव है कि एफआईआर में घटना या वारदात की पूरी जानकारी न हो और यह भी संभव है उसमें सभी आरोपियों के नाम न हो लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि ट्रायल कोर्ट किसी अन्य को बतौर आरोपी समन न करें। शीर्ष अदालत ने कहा कि षड्यंत्र, आर्थिक अपराध या चश्मदीद गवाहों से रहित मामलों में विस्तृत जांच के बाद में कई नए तथ्य सामने आते हैं।
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न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति शिव कीर्ति सिंह की पीठ ने ये  टिप्पणी उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले की ब्लॉक प्रमुख हरदई नामक महिला की उस याचिका को खारिज करते हुए दी है जिसमें उसने ट्रायल कोर्ट द्वारा बतौर आरोपी समन जारी करने को चुनौती दी थी। मनरेगा के तहत मिलने वाले फंड से 49 लाख रुपये गबन केआरोप में अमरोहा केचीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने महिला को बतौर आरोपी समन किया था। महिला की दलील थी कि एफआईआर में उसका नाम नहीं था।

यहां तक कि चार्जशीट में भी उसका नाम नहीं था। ट्रायल में अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए गवाहों के बयान के बाद महिला केखिलाफ समन जारी किया गया था। महिला का यह भी कहना था कि वह निरक्षर है और वह बमुश्किल हस्ताक्षर ही कर पाती हैं। वहीं यूपी सरकार ने आरोपी महिला केसमन किए जाने केनिर्णय को सही ठहराते हुए कहा कि महिला और ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर ने मिलकर फंड में हेराफेरी की है, ऐसे में महिला भी इसकेलिए जवाबदेह है। निरक्षर और हस्ताक्षर न कर पाना, बचाव का आधार नहीं हो सकता।
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शीर्ष अदालत ने महिला की दलीलों को नकारते हुए ट्रायल कोर्ट केफैसले को सही ठहराया है। पीठ ने यह भी कहा कि यह सच है कि संदिग्धों को पुलिस ट्रायल के लिए नहीं खींचना चाहती है लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि ट्रायल कोर्ट किसी और व्यक्ति को बतौर आरोपी समन नहीं कर सकता है। 
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