सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए नामों को क्लीयर करने में कथित तौर पर सरकार की देरी के खिलाफ दायर याचिका मंगलवार को सुनवाई के लिए लिस्टेड नहीं हुई। इस पर याचिकाकर्ता ने हैरानी जताई है। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धुलिया ने 20 नवंबर को इस याचिका पर सुनवाई की थी और मंगलवार को फिर से सुनवाई करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वकील ने पीठ को बताया कि याचिका मंगलवार को सुनवाई के लिए लिस्ट हुई थी लेकिन डिलीट हो गई।
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इस मामले पर एक और याचिका दायर हुई है। दूसरे याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने याचिका के लिस्ट से डिलीट होने पर हैरानी जताई। प्रशांत भूषण ने कहा कि याचिका लिस्ट करने के लिए न्यायिक आदेश था, इसके बावजूद याचिका का लिस्ट से डिलीट होना जाना असामान्य है।
सरोगेसी कानून से 'सिंगल मदर' के अधिकारों पर असर; सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
सरोगेसी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मांगा केंद्र सरकार से जवाब
- फोटो : amar ujala
सुप्रीम कोर्ट ने सरोगेसी कानून के प्रावधान से जुड़ी याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गया। इस कानूनी प्रावधान के कारण एकल अविवाहित महिलाओं को सरोगेसी के माध्यम से बच्चे पैदा करने की अनुमति नहीं है। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने मंगलवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और याचिका पर उससे जवाब मांगा।
संक्षिप्त सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता और पेशे से वकील नेहा नागपाल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल ने कहा, मौजूदा सरोगेसी नियमों में बड़े पैमाने पर कमियां हैं। इसके कारण संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत अधिकार का उल्लंघन) का उल्लंघन हो रहा है।
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, एकल अविवाहित महिलाएं सरोगेसी का विकल्प चुन सकती हैं या नहीं, यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की ही एक बड़ी पीठ के समक्ष लंबित हैं। इस पर वकील सौरभ किरपाल ने कहा कि इस मामले पर सुनवाई की जरूरत है क्योंकि इन कानूनी प्रावधानों से एक बड़ा संवैधानिक सवाल भी जुड़ा हुआ है।दोनों पक्षों की संक्षिप्त दलीलों को सुनने के बाद पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी किया।
उत्तराखंड में महिला की हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से रिपोर्ट मांगी
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार से 19 वर्षीय महिला की हत्या के मामले में सीलबंद लिफाफे में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। मृतका हत्या से पहले एक बर्खास्त भाजपा नेता के बेटे के रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थी। ऋषिकेश के पास के इस मामले में मंगलवार को न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और एसवीएन भट्टी की पीठ ने राज्य की तरफ से दायर दो रिपोर्ट पर गौर करने के बाद मामले की सुनवाई फरवरी 2024 में रखने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान एक पत्रकार और मृतक अंकिता भंडारी के परिवार के सदस्यों की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंसाल्वेस ने मामले में सीबीआई जांच की मांग की। जांच पर आशंका जताते हुए गोंसाल्वेस ने आरोप लगाया कि रिसॉर्ट से कोई सीसीटीवी फुटेज या फॉरेंसिक सबूत एकत्र नहीं किया गया था।
नागरिकता अधिनियम मामले में असम के लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे; CJI की पीठ में बोले अपनी ही धरती पर विदेशी और भूमिहीन...
नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि असम के स्वदेशी लोग अपनी ही मातृभूमि में भूमिहीन और विदेशी बनकर रहने को बाध्य हैं। कानून का यह हिस्सा केवल पूर्वोत्तर राज्य पर लागू है। मंगलवार को प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने असम के कई संगठनों की पैरवी की। बता दें कि शीर्ष अदालत असम में अवैध प्रवासियों से संबंधित नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता की जांच कर रही है। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील पर भी गौर किया। सीजेआई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने कहा कि वह असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की वैधता पर विचार नहीं कर रही है। अदालत इस मामले को नागरिकता कानून की धारा 6ए के पहलुओं तक ही सीमित रखेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए के लाभार्थियों का डेटा मांगा
नागरिकता कानून से जुड़ी एक अन्य घटना में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सरकार से असम में नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए के लाभार्थियों का डेटा मांगा। अदालत ने कहा कि उसके सामने ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे पता चल सके कि 1966 और 1971 के बीच बांग्लादेशी प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने का प्रभाव इतना बड़ा था कि सीमावर्ती राज्य की जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक पहचान पर इसका प्रभाव पड़ा।
असम में सीमा पार घुसपैठ की समस्या को स्वीकार करते हुए, मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बांग्लादेश की मुक्ति के लिए 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के मानवीय पहलू का भी उल्लेख किया। सरकार की दलील है कि मानवीय पहलू के कारण 52 साल पहले अप्रवासियों की आमद भी हुई।
पांच जजों की संविधान पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं। असम में अवैध प्रवासियों से संबंधित नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता की जांच करने के लिए अदालत ने 17 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई शुरू की है।