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SC: 'उम्रकैद की सजा में दोषियों को समय से पहले रिहा करने में कठोर शर्तें लगाना उचित नहीं', कोर्ट की टिप्पणी

Mon, 06 Jan 2025 04:24 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई से लोकपाल ने इन्कार कर दिया है। जस्टिस चंद्रचूड के खिलाफ पद पर रहते लोकपाल से शिकायत की गई थी। लोकपाल ने मामला अधिकार क्षेत्र से बाहर बता कर खारिज कर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उम्रकैद की सजा काट रहे दोषियों को समय से पहले रिहा करते समय उन पर कठोर शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ देशभर की जेलों में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषियों को छूट देने से जुड़े कई पहलुओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। 

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जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा, छूट देने की शर्तें इतनी कठोर नहीं होनी चाहिए कि उन्हें लागू करना मुश्किल हो, ऐसी शर्तें छूट के लाभ को निरर्थक बना देंगी। छूट की शर्तें ऐसी होनी चाहिए कि इसके उल्लंघन का आसानी से पता लगाया जा सके और अगर शर्तों के उल्लंघन के कारण छूट रद्द की जाती है तो दोषियों को सुनवाई का अधिकार होना चाहिए।

पीठ आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषियों को छूट का लाभ देते समय लगाई जाने वाली शर्तों और इसे कब रद्द किया जाना चाहिए उन स्थितियों पर विचार कर रही थी। एक अन्य मुद्दा यह था कि क्या राज्य सरकारें अपनी नीतियों के अनुसार उम्रकैद की सजा काट रहे पात्र दोषियों के स्थायी छूट के आवेदनों पर विचार करने के लिए बाध्य हैं, भले ही ऐसी कोई याचिका दायर न की गई हो। तीसरा सवाल यह था कि क्या ऐसे आवेदनों को खारिज करते समय कारण दर्ज करना आवश्यक है या नहीं।

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सिख विरोधी दंगे में सजा के खिलाफ सज्जन की याचिका पर जुलाई में सुप्रीम सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट 1984 के सिख विरोधी दंगे में सजा के खिलाफ कांग्रेस के पूर्व नेता सज्जन कुमार और पूर्व पार्षद बलवान खोखर की याचिकाओं पर जुलाई में सुनवाई करेगा। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने सोमवार को स्पष्ट किया कि अगर अंतिम सुनवाई निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार नहीं हो पाती है तो याचिकाकर्ता अदालत से सजा के निलंबन का अनुरोध कर सकते हैं। शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड तलब किए, जो सभी संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराए जाएंगे। पिछले साल जुलाई में शीर्ष अदालत ने सीबीआई से खोखर की राहत की मांग वाली याचिका पर जवाब देने को कहा था। खोखर की उम्रकैद की सजा को दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 में बरकरार रखा था, जबकि नवंबर में दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के पालम कॉलोनी में राज नगर पार्ट- 1 क्षेत्र में पांच सिखों की हत्या से संबंधित मामले में, 2013 में ट्रायल कोर्ट ने सज्जन कुमार को बरी करने के फैसले को पलट दिया था।
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निठारी हत्याकांड के आरोपी सुरेंद्र कोली पर 25 मार्च को सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह 2006 के निठारी सीरियल हत्याकांड मामले में सुरेंद्र कोली को बरी किए जाने के खिलाफ याचिकाओं पर 25 मार्च को सुनवाई करेगा। मामले में जस्टिस बीआर गवई और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि यह मामला यूपी के निठारी में हुई 'बहुत गंभीर और वीभत्स' हत्याओं से जुड़ा है।

वहीं सुरेंद्र कोली के वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ सबूत एक इकबालिया बयान है, जो मामले में पुलिस हिरासत के कई दिनों बाद दर्ज किया गया था। इस पीठ ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह अन्य संबंधित मामलों में ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड को शीघ्रता से तलब करे और मामले में पेश होने वाले वकीलों को इसकी प्रतियां उपलब्ध कराए। मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को निर्धारित की गई है। 2024 में, सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई और यूपी सरकार की तरफ से दायर अलग-अलग याचिकाओं की जांच करने पर सहमति व्यक्त की, जिसमें 16 अक्तूबर, 2023 को सुरेंद्र कोली को बरी करने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई थी। पीठ ने याचिकाओं पर सुरेंद्र कोली से जवाब मांगा था और इसे इसी तरह की लंबित याचिकाओं के साथ टैग किया था।

मई, 2024 में शीर्ष न्यायालय ने उच्च न्यायालय के बरी करने के फैसले को चुनौती देने वाली पीड़ितों में से एक के पिता की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति व्यक्त की। बता दें कि, सुरेंद्र कोली को 28 सितंबर, 2010 को ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी। इस मामले में मोनिंदर सिंह पंढेर और उनके घरेलू सहायक सुरेंद्र कोली पर यूपी के निठारी में अपने पड़ोस में लोगों, ज्यादातर बच्चों, के साथ बलात्कार और हत्या का आरोप था।

उच्च न्यायालय ने उन्हें मौत की सजा के मामले में बरी कर दिया और कहा कि अभियोजन पक्ष उनके अपराध को 'उचित संदेह से परे' साबित करने में विफल रहा है, जबकि इसे 'खराब' जांच भी कहा। सुरेंद्र कोली को 12 मामलों में और मोनिंदर सिंह पंढेर को दो मामलों में दी गई मौत की सजा को पलटते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा कि जांच 'जिम्मेदार एजेंसियों की तरफ से जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात से कम नहीं है'। उच्च न्यायालय ने कोली और पंढेर की तरफ से दायर कई अपीलों को स्वीकार कर लिया, जिन्होंने गाजियाबाद में सीबीआई अदालत की तरफ से दी गई मौत की सजा को चुनौती दी थी। साल 2007 में दोनों के खिलाफ कुल 19 मामले दर्ज किए गए थे, और सीबीआई ने सबूतों के अभाव में तीन मामलों में क्लोजर रिपोर्ट दायर की थी। कोली को बाकी 16 मामलों में से तीन में बरी कर दिया गया था, और एक मामले में उसकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया था। 

29 दिसंबर, 2006 को राष्ट्रीय राजधानी की सीमा से लगे नोएडा के निठारी में पंढेर के घर के पीछे एक नाले से आठ बच्चों के कंकाल मिलने के बाद हत्याओं का खुलासा हुआ। घर के आस-पास के इलाके में नालों की खुदाई और तलाशी के दौरान और भी कंकाल मिले। इनमें से ज्यादातर अवशेष बच्चों और युवतियों के थे जो इलाके में लापता हो गए थे। सीबीआई ने अपराध के 10 दिनों के भीतर ही मामले को अपने हाथ में ले लिया और उसकी तलाशी के बाद और भी मानव अवशेष बरामद हुए थे।
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