फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट: खनिजों पर रॉयल्टी बकाया की वसूली का मामला, राज्यों की याचिका पर सुनवाई के लिए गठित की जाएगी पीठ

Wed, 11 Sep 2024 11:23 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने खनिजों की खदानों को लेकर एक और अहम फैसला सुनाया था। अदालत ने कहा था कि खनिजों पर बकाया रॉयल्टी को भी राज्य सरकार वसूल सकेगी। अब राज्यों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई के लिए अदालत ने बड़ा फैसला लिया है।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को झारखंड जैसे खनिज समृद्ध राज्यों की याचिकाओं पर सुनवाई के लिए एक पीठ गठित करने पर सहमति जताई। अदालत ने कहा कि याचिकाओं में केंद्र और खनन कंपनियों से हजारों करोड़ रुपये मूल्य के खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि पर रॉयल्टी और कर बकाया वसूलने की मांग की गई है। इसलिए याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए एक पीठ गठित की जाएगी। 

विज्ञापन


पहले 25 जुलाई को सुनाया फैसला
प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय पीठ ने 25 जुलाई को 8:1 के बहुमत वाले फैसले में कहा था कि खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति राज्यों के पास है, संसद में नहीं। 

14 अगस्त को यह दी थी अनुमति
इसके बाद 14 अगस्त को दिए गए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने खनिज संपन्न राज्यों को बड़ी राहत देते हुए उन्हें खनिजों और खनिज-युक्त भूमि पर केंद्र सरकार से 12 वर्ष में क्रमबद्ध तरीके से रॉयल्टी तथा कर पर एक अप्रैल 2005 से बकाया लेने की बुधवार को अनुमति दे दी थी।
विज्ञापन


चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा था कि 25 जुलाई के आदेश को आगामी प्रभाव से लागू करने की दलील खारिज की जाती है। पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि इस अदालत ने उसके समक्ष आए सवालों का 8:1 के बहुमत से 25 जुलाई को जवाब दे दिया था। साथ ही खदानों, खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने का विधायी अधिकार राज्यों को दिया था।

31 जुलाई को हुई थी सुनवाई
उन्होंने कहा कि 25 जुलाई का फैसला सुनाने के बाद केंद्र सरकार ने इस फैसले को आगामी प्रभाव से लागू करने का अनुरोध किया था। मामले पर 31 जुलाई को सुनवाई की गई थी। केंद्र ने खनिज संपन्न राज्यों को 1989 से खनिजों और खनिज-युक्त भूमि पर लगाई गई रॉयल्टी उन्हें वापस करने की मांग का विरोध करते हुए कहा था कि इसका असर नागरिकों पर पड़ेगा और प्रारंभिक अनुमान के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (पीएसयू) को अपने खजाने से 70,000 करोड़ रुपये निकालने पड़ेंगे।

याचिकाओं को एक पीठ को आवंटित किया जाए: झारखंड सरकार
झारखंड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने बुधवार को मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ से आग्रह किया कि बकाया राशि की वसूली और उसे वसूलने में आने वाली कानूनी बाधाओं से संबंधित याचिकाओं को एक पीठ को आवंटित किया जाए।

अधिवक्ता ने कहा, 'यह नौ न्यायाधीशों की पीठ के फैसले के बाद उठाए जाने वाले कदमों के बारे में है। सभी मामलों को अब एक साथ रखा गया है।'

यह बोले सीजेआई
कुछ निजी खनन फर्मों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने कहा कि अब राज्य सरकारें धन की वसूली चाहती हैं। इस पर सीजेआई ने कहा, 'मैं पीठ गठित करूंगा। इसमें उन न्यायाधीशों में से एक को नियुक्त करूंगा, जो (संविधान) पीठ में हमारे साथ थे।'

क्या है रॉयल्टी?
दरअसल, जहां कहीं भी खनिजों की खदान पाई जाती है उसे किसी कंपनी को अलॉट किया जाता है। इस खदान से निकलने वाले खनिज पर जो पैसे सरकार को दिए जाते हैं उसे ही रॉयल्टी कहा जाता है। सरकार उस जमीन का पट्टा देने के लिए टैक्स अलग से भी लेती है। यानी जमीन के लिए अलग टैक्स और उस जमीन से निकलने वाले खनिज की मात्रा पर रॉयल्टी देनी पड़ती है। अभी तक इन पैसों पर केंद्र सरकार का अधिकार था लेकिन अब इसे राज्य को दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट से बोले अटॉर्नी जनरल- मौलिक कर्तव्य पालन के लिए किया जा रहा काम
अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने बुधवार को सप्रीम कोर्ट को बताया कि मौलिक कर्तव्यों के पालन के लिए लगातार काम किया जा रहा है। इसके लिए कर्तव्य-विशिष्ट कानून, योजनाएं और पर्यवेक्षण की जरूरत है।  शीर्ष अदालत ने वकील दुर्गा दत्त द्वारा संविधान में निहित मौलिक कर्तव्यों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अच्छी तरह परिभाषित कानून/नियम बनाने के लिए केंद्र को निर्देश देने वाली याचिका पर सुनवाई की। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी करते हुए शीर्ष विधि अधिकारी से सहायता मांगी थी। अटॉर्नी जनरल ने न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ से कहा कि न्यायपालिका का काम विधायिका को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने का निर्देश देना नहीं है। न्यायालयों को किसी भी अंतर को भरने के लिए कदम उठाने में सावधानी बरतनी चाहिए, खासकर तब जब विधायिका द्वारा मुद्दे पर सक्रिय रूप से विचार किया जा रहा हो। उन्होंने कहा कि न्यायालय मौलिक कर्तव्यों के पालन को लेकर कदम उठाने में लगातार सक्रिय रहा है। शीर्ष अदालत मामले में अगली सुनवाई आठ सप्ताह बाद करेगी।

हल्द्वानी अतिक्रमण मामले में दो महीने में पुनर्वास प्रस्ताव पेश करे उत्तराखंड सरकार
हल्द्वानी अतिक्रमण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को 50 हजार लोगों के पुनर्वास के लिए दो महीने में प्रस्ताव पेश करने का समय दिया। इन लोगों को हल्द्वानी में रेलवे की जमीन से अतिक्रमण रोधी अभियान के तहत हटाया जाना है। उत्तराखंड सरकार ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां की पीठ को बताया कि अदालत के पहले के आदेश के अनुपालन में राज्य, रेलवे और अन्य हितधारकों की संयुक्त बैठक हुई थी। रेलवे की परियोजना के लिए आवश्यक जमीन की पहचान की प्रक्रिया प्रगति पर है। पीठ ने कहा कि परियोजना से जिन लोगों के प्रभावित होने की आशंका है। उनके पुनर्वास का मामला भी सक्रियता से विचाराधीन है और दो महीने बाद ठोस प्रस्ताव रखा जाए। उच्चतम न्यायालय केंद्र द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें उसके पिछले साल पांच जनवरी के आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया गया है। न्यायालय ने हल्द्वानी में लगभग 30 एकड़ भूमि से अतिक्रमण हटाने के उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी थी, जिस पर रेलवे ने दावा किया है। सुनवाई के दौरान उत्तराखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने पुनर्वास प्रस्ताव को अंतिम रूप देने के लिए दो महीने का समय मांगा। उन्होंने कहा कि इस जमीन पर लगभग 4,500 परिवार रहते हैं और उनके पुनर्वास के लिए रेलवे और राज्य के बीच वित्तीय व्यवस्था की जानी है। 
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट ने एनएमसी पर लगाया 10 लाख का जुर्माना
 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) से निष्पक्ष व उचित तरीके से काम करने की उम्मीद की जाती है। केरल हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती वाली याचिकाओं को 10 लाख रुपये के जुर्माने के साथ खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने यह कार्रवाई की। जस्टिस बीआर गवई व जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ शैक्षणिक वर्ष 2023-24 के लिए एक मेडिकल कॉलेज को 150 से 250 तक सीटें बढ़ाने के लिए दी गई मंजूरी को वापस लेने से जुड़े मामले में एनएमसी और अन्य की याचिकाओं पर विचार कर रही थी।

पीठ ने कहा, किसी पक्ष को अनुमति लेने के लिए अदालत दर अदालत दौड़ाना, खासतौर पर तब जब संस्थान 18 साल से काम कर रहा हो, संस्थान को परेशान करने का एक प्रयास मात्र है। पीठ ने 9 सितंबर को पारित अपने आदेश में कहा, प्रथम दृष्टया, हम पाते हैं कि एनएमसी का रवैया आदर्श वादी जैसा नहीं है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें