उच्चतम न्यायालय हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट की जांच के लिए शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में एक समिति गठित करने का केंद्र को निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है।
याचिका दायर करने वाले वकील विशाल तिवारी ने गुरुवार को प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। पीठ में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जेबी पारदीवाला भी शामिल थे। तिवारी ने पीठ को बताया कि इस मुद्दे पर दायर एक अलग याचिका को 10 फरवरी को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाना है।
गुजरात सरकार द्वारा जिला अदालतों के बुनियादी ढांचे के प्रस्तावों को वर्षों से लंबित रखने पर आपत्ति जताई
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार द्वारा जिला अदालतों के बुनियादी ढांचे में सुधार के प्रस्ताव को वर्षों से लंबित रखे जाने पर गुरुवार को नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और जे बी पारदीवाला की पीठ ने रिक्तियों को भरने सहित देश भर में न्यायिक बुनियादी ढांचे में सुधार से संबंधित एक मामले की सुनवाई की।
इस दौरान पीठ ने कहा कि गुजरात द्वारा प्रस्तावों को आठ साल तक लंबित रखने का कोई औचित्य नहीं है। उच्च न्यायालय और राज्य के बीच उचित समन्वय सुनिश्चित करेगा कि प्रस्तावों को मंजूरी दी जाए। उन्होंने कहा कि हम निर्देश देते हैं कि कम से कम 40 प्रस्तावों को जल्द से जल्द मंजूरी दी जाए। पीठ ने यह भी कहा कि राज्य के कानून सचिव और उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल अन्य प्रस्तावों के संबंध में प्रगति की निगरानी करेंगे।
इससे पहले न्यायमित्र विजय हंसारिया और अधिवक्ता स्नेहा कलिता ने शीर्ष अदालत को बताया कि मध्य प्रदेश की जिला अदालतों में 650 से अधिक पद खाली पड़े हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में न्यायिक अधिकारियों के स्वीकृत 2,021 पदों के मुकाबले 1,541 अदालत कक्ष उपलब्ध हैं।
देश भर की जिला अदालतों में बुनियादी ढांचे और रिक्तियों को दाखिल करने से संबंधित मामले में चार "अमीकी क्यूरी" (अदालत के मित्र) में से एक के रूप में शीर्ष अदालत की सहायता करने वाले हंसारिया ने अपनी छठी रिपोर्ट दायर की है। इस रिपोर्ट में ओडिशा, मध्य प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा और पुडुचेरी और चंडीगढ़ के केंद्र शासित प्रदेशों में रिक्तियों और बुनियादी ढांचे का विवरण दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने की इलाहाबाद समेत पांच हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस की नियुक्ति की सिफारिश
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने ब़ृहस्पतिवार को इलाहाबाद समेत पांच हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सिफारिश की है। इनमें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस प्रीतिंकर दिवाकर को इलाहाबाद हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश है।
कॉलेजियम ने इनके अलावा मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस टीएस शिवगननम को कलकत्ता हाईकोर्ट और जस्टिस रमेश सिन्हा को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की। वहीं जस्टिस सोनिया जी गोकणी को गुजरात हाईकोर्ट और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के जस्टिस धीरज सिंह ठाकुर को मणिपुर हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस रहे जस्टिस राजेश बिंदल को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किये जाने के बाद से यह पद खाली है। वहीं कलकत्ता हाईकोर्ट में मौजूदा चीफ जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव के 30 मार्च को सेवानिवृत्त होने के बाद पद खाली हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को 2011 के कुछ फैसलों की समीक्षा की मांग वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। याचिकाओं में कहा गया था कि प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता किसी व्यक्ति को तब तक अपराधी नहीं बनाएगी जब तक कि वह हिंसा का सहारा नहीं लेता या लोगों को हिंसा के लिए उकसाता नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा, जब 2011 का फैसला आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1987 (अब निरस्त) की धारा 3 (5) को पढ़ते हुए पारित किया गया था, तब उसके दो जजों की पीठ ने भारत सरकार का पक्ष नहीं सुना था।
सुप्रीम कोर्ट ने 3 फरवरी, 2011 को संदिग्ध उल्फा सदस्य अरूप भुइयां को बरी कर दिया था। उन्हें टाडा अदालत ने पुलिस अधीक्षक के समक्ष उनके कथित इकबालिया बयान के आधार पर दोषी ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केवल प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता से काम नहीं चलेगा। किसी व्यक्ति को अपराधी तभी माना जाएगा जब वह हिंसा का सहारा लेता या लोगों को हिंसा के लिए उकसाता है या हिंसा उकसाने के लिए सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2011 के इंद्र दास बनाम असम सरकार और केरल सरकार बनाम रानीफ के दो अन्य फैसलों में भी इसी तरह के विचार रखे थे। इसमें बेंच ने अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के तीन फैसलों पर भरोसा किया, जिसमें ‘एसोसिएशन के अपराध’ के सिद्धांत को खारिज कर दिया है। पीठ ने कहा, हमने दलीलें सुन ली हैं और फैसला सुरक्षित रख लिया। यह संघ के वकील के लिए खुला रहेगा। केंद्र और राज्य सरकार के वकील दो दिन तक अपनी लिखित प्रस्तुति दे सकते हैं। पीठ ने कहा, केंद्र को सुनने की जरूरत है। उसे यह बताने का मौका दिया जाए कि संसद की क्या मंशा थी, क्योंकि पिछले आदेश से यह पहलू गायब है।
सरकार की जिम्मेदारी
पीठ ने हस्तक्षेपकर्ता के वकील संजय पारिख से कहा, संसद के कानून बनने के बाद अदालतों की सर्वोच्चता है। आखिरकार, संसद से पारित कानून की समीक्षा करने और इसे आसांविधानिक या सांविधानिक घोषित करना अदालत का काम है। लेकिन यह सरकार का अधिकार है कि वह अपने कानूनों को आसांविधानिक घोषित होने से बचाए। पारिख ने बताया कि हाईकोर्ट के 26 मामलों में 2011 के तीन फैसलों का पालन किया गया है।