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Supreme Court: 'समीक्षा आदेश अलमारी में रखने के लिए नहीं', जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट बैन पर 'सुप्रीम' टिप्पणी

Tue, 30 Jan 2024 04:51 PM IST
आदर्श शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट सेवाओं की बहाली मामले सेे जुड़े विशेष समिति के समीक्षा आदेश को प्रकाशित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। मामले पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि समीक्षा आदेश अलमारी में रखने के लिए नहीं है। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट सेवाओं की बहाली मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की गई। मामले से जुड़ी विशेष समिति की समीक्षा आदेशों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह अलमारी में रखने के लिए नहीं हैं। कोर्ट ने सख्त लहजें में प्रशासन से उन्हें प्रकाशित करने को कहा है। 
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विशेष समिति के आदेशों को प्रकाशित करने की मांग
फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की गई, जिसमें जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट प्रतिबंधों पर केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता वाली एक विशेष समिति द्वारा पारित समीक्षा आदेशों को प्रकाशित करने की मांग की गई थी। दो जजों की खंडपीठ ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि हमें समझ नहीं आ रहा है कि समीक्षा आदेश किस लिए हैं। कोर्ट ने कहा कि समीक्षा आदेश अलमारी में रखने के लिए नहीं हैं। नटराज ने कहा कि याचिकाकर्ता समिति के समीक्षा आदेश के प्रकाशन की मांग कर रहा है। 

समिति के समीक्षा आदेशों को प्रकाशित करना जरूरी- कोर्ट
पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि हमारा विचार है कि समिति के विचार विमर्श को प्रकाशित करना आवश्यक नहीं है, लेकिन पारित समीक्षा आदेशों को प्रकाशित करना जरूरी है। कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज को निर्देश लेने और सुनवाई की अगली तारीख पर कोर्ट को अवगत कराने के लिए दो सप्ताह का समय दिया।
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याचिकाकर्ता ने समीक्षा आदेशों को प्रकाशित करने की थी मांग
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील शादान फरासत ने सुनवाई के दौरान कहा था कि प्रशासन को अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में 2020 के फैसले के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट प्रतिबंधों पर समीक्षा आदेश और मूल आदेश प्रकाशित करना आवश्यक है। 

क्या है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई 2020 को जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट सेवाओं की बहाली की याचिका पर विचार करने के लिए केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष समिति के गठन का आदेश दिया था। जिमसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकारों को संतुलित करने की आवश्यकता है। गौरतलब है कि 10 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने अनुराधा भसीम बनाम भारत संघ के फैसले में कहा था कि बोलने की स्वतंत्रता औ इंटरनेट के जरिए व्यापार करने की स्वतंत्रता संविधान के तहत संरक्षित है। इसमें जम्मू-कश्मीर प्रशासन से प्रतिबंध आदेशों की तुरंत समीक्षा करने को कहा था। 
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पेड़ों की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी- सुप्रीम कोर्ट
ताज ट्रेपेजियम जोन में एक सड़क परियोजना के निर्माण के लिए काटे जा रहे पेड़ मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम टिप्पणी दी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि पेड़ों को कटान से बचाने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। कोर्ट ने कहा कि राज्य की जिम्मेदारी है कि वह अधिकतम पेड़ों की रक्षा करें। कोर्ट ने परियोजना के लिए 3,874 पेड़ों को काटने के लिए वैकल्पिक समाधान तलाशने को कहा है। गौरतलब है कि ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) लगभग 10,400 वर्ग किमी में फैला है और उत्तर प्रदेश के आगरा, फिरोजाबाद, मथुरा, हाथरस और एटा जिलों और राजस्थान के भरतपुर जिले में फैला हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ताज महल और उसके आस-पास के संरक्षण पर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। 
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क्या मुस्लिम कानून के तहत विरासत अधिकारों पर फैसले में हिंदू कानून लागू होंगे...होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट यह परीक्षण करने के लिए तैयार हो गया है कि क्या मुस्लिम कानून के तहत विरासत के अधिकारों पर फैसला करते समय हिंदू कानून के सिद्धांतों को लागू किया जा सकता है। जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने बंटवारे के एक मामले में नोटिस जारी करते हुए आदेश दिया है।  
दरअसल, वादी (सिराजुद्दीन और फयाजुद्दीन) प्रतिवादी नंबर 2 (रियाजुद्दीन) की पहली शादी से उसके बेटे हैं। उन्होंने अपने वैध हिस्से का दावा करते हुए बंटवारे का मुकदमा दायर किया था। उन्होंने तर्क दिया था कि पिता ने अन्य महिला से अवैध रिश्ता कायम किया और उससे उसे दो बच्चे हैं। आरोप लगाया गया कि पिता ने भी जानबूझकर उन्हें और उनकी मां को छोड़ दिया। जब पैतृक संपत्ति के बंटवारे की मांग की तो पिता ने इससे इन्कार कर दिया, जिसके बाद मुकदमा दायर किया गया।

हाईकोर्ट में पिता ने तर्क दिया कि उसने अपनी पहली पत्नी को तलाक दे दिया था और स्थायी गुजारा भत्ता के लिए एक निश्चित राशि का भुगतान भी किया था। वादी की मां ने राशि स्वीकार कर ली और संपत्तियों पर अपना अधिकार छोड़ दिया। पुत्रों ने तर्क दिया कि ‘कर्ता’ के अलावा कोई भी व्यक्ति त्याग नहीं कर सकता है। मां कर्ता नहीं है। वह नाबालिग बच्चों के शेयर नहीं छोड़ सकती। हाईकोर्ट ने माना कि मां नाबालिग बच्चों का अधिकार नहीं छोड़ सकती और अपील की अनुमति दी।

 पिता ने किया सुप्रीम कोर्ट का रुख
पिता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम परिवार में विभाजन विवाद को निपटाने के लिए एक हिंदू अविभाजित परिवार के कर्ता पर लागू सिद्धांतों को लागू करने में गलती की है।

अपराध इसलिए नहीं किया गया कि पीड़िता एससी वर्ग से थी...आरोपी बरी
 सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जाति (एससी) की किसी महिला का अपमान करने, उसकी लज्जा भंग करने या हमला करने के अपराध में आरोपी को केवल तभी दोषी ठहराया जा सकता है, जब अपराध सिर्फ इसलिए किया गया हो कि पीड़िता एससी जाति से थी। इस टिप्पणी के साथ पीठ ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपीलकर्ता दशरथ साहू की सजा रद्द कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर के अनुसार, पीड़िता घरेलू सहायिका थी तो अपीलकर्ता ने उसकी लज्जा भंग करने की कोशिश की। ऐसे में यहां तक कि पीड़िता के उच्चतम आरोपों को लें, आरोपी ने आपत्तिजनक कृत्य इस इरादे से नहीं किया कि वह अनुसूचित जाति से संबंधित व्यक्ति के साथ ऐसा कर रहा था।  
 
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