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Supreme Court: मणिपुर हिंसा मामले में महिला वकील की राहत बढ़ी; बिलकिस केस में दोषियों की सजा पर सात को सुनवाई

Mon, 17 Jul 2023 09:52 PM IST
देव कश्यप पीटीआई, नई दिल्ली।

सार

शीर्ष अदालत ने पहले 11 जुलाई को वकील को दंडात्मक कार्रवाई से बचाया था और बाद में टीम के सदस्यों की कथित टिप्पणियों पर मणिपुर पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के संबंध में राहत को 17 जुलाई तक बढ़ा दिया था। द्विवेदी ने टिप्पणी की थी कि राज्य में जातीय हिंसा "राज्य द्वारा प्रायोजित" थी। .
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सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मणिपुर पुलिस द्वारा एक तथ्य-खोज मिशन के सदस्यों के कथित बयानों पर दर्ज की गई एफआईआर के संबंध में एक महिला वकील को दी गई गिरफ्तारी से सुरक्षा की अवधि को चार सप्ताह के लिए बढ़ा दिया।

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मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने महिला वकील दीक्षा द्विवेदी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे से आगे की राहत के लिए सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत से संपर्क करने को कहा। मामले का निपटारा करते हुए पीठ ने कहा कि द्विवेदी मणिपुर की एक अदालत के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से पेश हो सकती हैं और शिकायत की स्थिति में वह फिर से शीर्ष अदालत का रुख कर सकती हैं।

मणिपुर सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि अगर इलाहाबाद की एक वकील "हिंसा भड़काने" के लिए राज्य का दौरा कर सकती है, तो वह शारीरिक रूप से भी वहां की अदालत में पेश हो सकती है। उन्होंने कहा कि यह एक वकील का मामला है, जो यहां भाषण देने के बाद मणिपुर चली गईं और अब वह अदालत के सामने वहां नहीं आना चाहतीं।
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शीर्ष अदालत ने पहले 11 जुलाई को वकील को दंडात्मक कार्रवाई से बचाया था और बाद में टीम के सदस्यों की कथित टिप्पणियों पर मणिपुर पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के संबंध में राहत को 17 जुलाई तक बढ़ा दिया था। द्विवेदी ने टिप्पणी की थी कि राज्य में जातीय हिंसा "राज्य द्वारा प्रायोजित" थी। .

सीपीआई नेता और नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमेन (एनएफआईडब्ल्यू) की महासचिव एनी राजा सहित तथ्य-खोज समिति के सदस्यों के खिलाफ आठ जुलाई को एफआईआर दर्ज की गई थी। जिन दंडात्मक धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी उनमें देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने से संबंधित धारा भी शामिल थी।

इससे पहले पीठ ने कहा था, 14 जुलाई, 2023 की शाम पांच बजे तक इंफाल पुलिस स्टेशन में दर्ज आठ जुलाई, 2023 की एफआईआर के अनुसरण में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा। द्विवेदी महिला वकीलों के संघ, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमेन (एनएफआईडब्ल्यू) की तीन सदस्यीय तथ्य-खोज टीम का हिस्सा थीं।

10 जुलाई को शीर्ष अदालत ने राज्य में हिंसा पर कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा था कि यह राज्य में तनाव बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला मंच नहीं है। साथ ही अदालत ने संघर्षरत जातीय समूहों से अदालती कार्यवाही के दौरान संयम बरतने को कहा था। 

बिलकिस बानो मामला: दोषियों को सजा में छूट के खिलाफ याचिकाओं पर न्यायालय सात अगस्त को करेगा अंतिम सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो सामूहिक दुष्कर्म और उसके परिवार के सदस्यों की हत्या के मामले में सभी 11 दोषियों को पिछले साल दी गई सजा में छूट को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू करने के लिए सात अगस्त की तारीख तय की। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि दलीलें पूरी हो चुकी हैं और सभी दोषियों को समाचार पत्र प्रकाशनों के माध्यम से या सीधे नोटिस दिए गए हैं।

पीठ ने कहा, हमारा मानना है कि मामले में दलीलें पूरी हो चुकी हैं और सभी उत्तरदाताओं को सभी मामलों में समाचार पत्रों के प्रकाशनों के माध्यम से या सीधे तौर पर नोटिस दिए गए हैं। हम मामले को सात अगस्त को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करते हैं। सभी पक्षों को संक्षिप्त लिखित दलील, सारांश और तारीखों की सूची दाखिल करनी होगी।

इससे पहले शीर्ष अदालत ने नौ मई को उन दोषियों के खिलाफ गुजराती और अंग्रेजी सहित स्थानीय समाचार पत्रों में नोटिस प्रकाशित करने का निर्देश दिया था, जिन्हें नोटिस नहीं दिया जा सका, जिसमें वह व्यक्ति भी शामिल था, जिसके घर पर स्थानीय पुलिस ने ताला लगा हुआ पाया था और उसका फोन भी बंद था। सभी 11 दोषियों को गुजरात सरकार ने छूट दे दी थी और पिछले साल 15 अगस्त को रिहा कर दिया गया था। इसके बाद बानो ने दोषियों को दी गई सजा में छूट को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की है।

सजा में छूट के खिलाफ माकपा नेता सुभाषिनी अली, स्वतंत्र पत्रकार रेवती लाल, लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूप रेखा वर्मा सहित कई अन्य ने जनहित याचिकाएं दायर की हैं। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसद महुआ मोइत्रा ने भी दोषियों को दी गई सजा में छूट और रिहाई के खिलाफ जनहित याचिका दायर की है। बता दें कि गोधरा ट्रेन अग्निकांड की घटना के बाद भड़के दंगों के दौरान बानो से सामूहिक दुष्कर्म किया गया था। बानो तब 21 साल की थी और पांच महीने की गर्भवती थी। दंगों में उसकी तीन साल की बेटी समेत परिवार के सात सदस्यों को मार दिया गया था।

असम में पुलिस मुठभेड़ों के खिलाफ जनहित याचिका पर SC ने जारी किया नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने गौहाटी उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सोमवार को असम सरकार और अन्य से जवाब मांगा। उच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के मई 2021 में शासन की बागडोर संभालने के बाद से हुई सिलसिलेवार पुलिस मुठभेड़ों पर एक जनहित याचिका खारिज कर दी थी। न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने वकील आरिफ मोहम्मद यासीन जवादर द्वारा दायर अपील पर राज्य सरकार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और अन्य को नोटिस जारी किए।

गौहाटी उच्च न्यायालय ने 27 जनवरी को जनहित याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि किसी अलग जांच की आवश्यकता नहीं है क्योंकि राज्य सरकार पहले से ही प्रत्येक मामले में अलग से जांच कर रही है। मामले में एक सरकारी हलफनामे का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि मई 2021 और अगस्त 2022 के बीच 171 घटनाओं में 56 लोग मारे गए, जिनमें से चार व्यक्ति हिरासत में मारे गए। इसके अलावा 145 अन्य घायल हुए।

जवादर (Jwadder) ने जनहित याचिका में दावा किया कि मई 2021 में हिमंत बिस्व सरमा के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के बाद से असम पुलिस और विभिन्न मामलों के आरोपियों के बीच 80 से अधिक “फर्जी मुठभेड़” हुई हैं। इसके परिणामस्वरूप 28 लोगों की मौत हो गई और 48 से अधिक घायल हो गए। जनहित याचिका में कहा गया है कि मारे गए या घायल हुए लोग खूंखार अपराधी नहीं थे और सभी मुठभेड़ों में पुलिस की कार्यप्रणाली एक जैसी रही है।

जवादर ने अदालत की निगरानी में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जैसी किसी स्वतंत्र एजेंसी, विशेष जांच दल (एसआईटी) या अन्य राज्यों की पुलिस टीम से जांच कराए जाने की मांग की। याचिका में कहा गया है कि अखबारों में प्रकाशित पुलिस के बयानों के अनुसार, हर मामले में आरोपियों ने पुलिसकर्मियों के सरकारी हथियार छीनने की कोशिश की और आत्मरक्षा में पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की, जिसके परिणामस्वरूप कथित अपराधी की मौत हो गई या वह घायल हो गया।

मामले में असम सरकार के अलावा, असम पुलिस महानिदेशक, राज्य के कानून और न्याय विभाग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और असम मानवाधिकार आयोग को प्रतिवादी बनाया गया है।

न्यायिक कार्य रोकना स्वीकार्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि अदालतों को काम करने से रोकना "स्वीकार्य नहीं" है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) से एक हलफनामा दायर करने को कहा, जिसमें बताया जाए कि पिछले एक साल में जब बार एसोसिएशनों ने हड़ताल का आह्वान किया, तो क्या कार्रवाई की गई। शीर्ष अदालत  वकीलों की हड़ताल के खिलाफ अदालत के आदेश के कथित उल्लंघन पर एनजीओ 'कॉमन कॉज' द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असली मुद्दा यह है कि अदालतों के काम में बाधा नहीं डाली जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति एसके कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि न्याय की अदालतें काम करना बंद नहीं कर सकतीं। अदालन ने कहा कि बड़ी संख्या में मामले होने के कारण लोगों को जमानत नहीं मिल पा रही है। पीठ ने कहा, जब काम से परहेज किया जाता है, तो अदालतों के लिए इसे समायोजित करना बहुत मुश्किल हो जाता है। ये व्यावहारिक समस्याएं हैं। उन्होंने आगे कहा, जब आप अदालतों का काम करना बंद कर देते हैं, यह कुछ ऐसा है जो स्वीकार्य नहीं है।

बीसीआई के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने पीठ को बताया कि शीर्ष बार निकाय ने इस मुद्दे पर नियम बनाए हैं। एनजीओ की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि उन्हें नियमों की कॉपी नहीं मिली है और आज भी दिल्ली हाई कोर्ट में वकीलों की हड़ताल है।

न्यायमूर्ति गौरांग कंठ के कलकत्ता उच्च न्यायालय में स्थानांतरण के खिलाफ "सांकेतिक विरोध" के लिए उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के आह्वान पर दिल्ली उच्च न्यायालय के वकीलों ने सोमवार को काम नहीं किया। वे उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की कार्य क्षमता में कमी की शिकायत कर रहे थे।

न्यायमूर्ति कौल ने कहा, ऐसा सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं होता? क्योंकि वहां एक विचार प्रक्रिया है कि अदालत का कामकाज बाधित नहीं होना चाहिए। दृष्टिकोण में मतभेद हो सकते हैं। हर किसी को अलग-अलग दृष्टिकोण रखने का अधिकार है। पीठ ने बीसीआई को यह बताते हुए कि पिछले एक साल में किस बार एसोसिएशन ने हड़ताल का आह्वान किया है और क्या कार्रवाई की गई, दो सप्ताह के भीतर एक हलफनामा दाखिल करने को कहा।

इस साल जनवरी में मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने राज्यों में वकीलों को हड़ताल पर जाने से रोकने के लिए एक ठोस योजना बनाने में देरी को चिह्नित किया था और बीसीआई को पेशेवर शिष्टाचार के नियमों को मजबूत करने के लिए कहा था।

एक अलग मामले में, शीर्ष अदालत ने 20 अप्रैल को एक आदेश पारित किया था और कहा था कि कोई भी वकील हड़ताल पर नहीं जा सकता या अदालती काम से दूर नहीं रह सकता। सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों से अधिवक्ताओं की समस्याओं के समाधान के लिए अपने मुख्य न्यायाधीशों की अध्यक्षता में 'शिकायत निवारण समिति' गठित करने को कहा था।

केंद्र 31 अगस्त तक औद्योगिक न्यायाधिकरणों के 9 पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति को अधिसूचित करे: SC

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र को निर्देश दिया कि वह 31 अगस्त तक शॉर्टलिस्ट किए गए नौ उम्मीदवारों को औद्योगिक न्यायाधिकरणों के पीठासीन अधिकारियों के रूप में नियुक्त करे। पीठ ने कहा कि उसे यह बताया गया कि हाल ही में शीर्ष अदालत के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले एक पैनल ने नामों को मंजूरी दे दी थी।

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बलबीर सिंह की दलीलों पर ध्यान दिया कि नियुक्तियों के लिए नौ लोगों को शॉर्टलिस्ट किया गया है। पीठ ने कहा, केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय इन नियुक्तियों को 31 अगस्त या उससे पहले अधिसूचित करेगा। इसके साथ ही लेबर लॉ एसोसिएशन द्वारा दायर जनहित याचिका का निपटारा कर दिया। हालांकि, पीठ ने एसोसिएशन को किसी भी शिकायत के मामले में फिर से अदालत में जाने की छूट दी।

बता दें कि देश में 22 सीजीआईटी-सह-एलसी हैं जो केंद्रीय क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए औद्योगिक विवाद (आईडी) अधिनियम, 1947 के प्रावधानों के तहत स्थापित किए गए थे। आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, औद्योगिक न्यायाधिकरणों की स्थापना औद्योगिक विवादों के त्वरित और समय पर निपटान के माध्यम से औद्योगिक क्षेत्र में शांति और सद्भाव बनाए रखने के उद्देश्य से की गई थी, ताकि किसी भी व्यापक औद्योगिक अशांति के कारण औद्योगिक विकास प्रभावित न हो।

पेटा ने 'जल्लीकट्टू' और अन्य पशु खेल को लेकर किया सुप्रीम कोर्ट का रुख

पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) ने तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक के संशोधित कानूनों की वैधता को बरकरार रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के 18 मई के फैसले की समीक्षा के लिए शीर्ष अदालत का रुख किया है। अदालत ने अपने फैसले में सांडों को वश में करने वाले खेल 'जल्लीकट्टू', बैलगाड़ी दौड़ और भैंस दौड़ ‘कंबाला’ को अनुमति दी थी। अपनी पुनर्विचार याचिका में पेटा ने कहा है कि फैसले के रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटियां हैं और शीर्ष अदालत द्वारा पुनर्विचार क्षेत्राधिकार के प्रयोग की आवश्यकता है।

एक सर्वसम्मत फैसले में, न्यायमूर्ति केएम जोसेफ (अब सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गौर किया था कि जानवरों के प्रति क्रूरता की रोकथाम (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम, 2017, जानवरों के प्रति क्रूरता की रोकथाम (महाराष्ट्र संशोधन) अधिनियम, 2017 और जानवरों के प्रति क्रूरता निवारण (कर्नाटक दूसरा संशोधन) अधिनियम, 2017 को संबंधित राज्य विधानसभाओं द्वारा अधिनियमित किया गया था और उन्हें राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त थी।

‘जलीकट्टू’, जिसे ‘एरुथाझुवुथल’ भी कहा जाता है, तमिलनाडु में पोंगल फसल उत्सव के हिस्से के रूप में खेला जाने वाला एक खेल है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि 'जल्लीकट्टू' एक प्रकार का गोवंशीय खेल है और हमारे सामने पेश की गई सामग्री के आधार पर हम संतुष्ट हैं कि यह तमिलनाडु राज्य में कम से कम पिछली कुछ शताब्दियों से चल रहा है। 

फैसले की समीक्षा की मांग करते हुए पेटा ने अपनी याचिका में कहा है कि ये 'खेल' बैल, बैलों और भैंसों की प्राकृतिक प्रवृत्ति, व्यवहार और शारीरिक रचना के खिलाफ हैं। कोई आवश्यक उद्देश्य पूरा नहीं करते हैं और उनमें इस्तेमाल किए गए जानवरों के लिए अनकही पीड़ा, दर्द और क्रूरता का कारण बनते हैं। याचिका में दावा किया गया है कि शीर्ष अदालत ने सरकार द्वारा इन अधिनियमों के तहत बनाए गए अधीनस्थ नियमों या अधिसूचनाओं के एकमात्र आधार पर लगाए गए संशोधनों, जो विधायी अधिनियम हैं, को उचित ठहराकर कानून की गंभीर त्रुटि की है। इसमें कहा गया है कि इसे लेकर जो फैसला आया था वह ''न्याय की गंभीर विफलता'' को जन्म देता है।

पश्चिम बंगाल रामनवमी हिंसा: हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ राज्य की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में 21 को होगी सुनवाई 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह पश्चिम बंगाल में रामनवमी समारोह के दौरान हिंसा की घटनाओं की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपने के कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका पर 21 जुलाई को सुनवाई करेगा। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने जानना चाहा कि क्या राज्य पुलिस द्वारा दर्ज की गई छह प्राथमिकियां एक ही घटना से संबंधित हैं।

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे। राज्य की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पीठ को बताया कि 30 मार्च और दो अप्रैल को हुई घटनाओं के लिए एफआईआर दर्ज की गई थीं। पीठ ने पूछा, "छह एफआईआर हैं... क्या वे सभी एक ही घटना से संबंधित हैं? क्या एफआईआर ओवरलैप होती हैं?"

पीठ ने कहा, 'आखिरकार, हमें आरोपों के मूल स्वरूप को देखना होगा। इसी के साथ मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को तय कर दी। इससे पहले शीर्ष अदालत ने 19 मई को जांच एनआईए को सौंपने के उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद आतंकवाद रोधी जांच एजेंसी ने मामला दर्ज किया है।

लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल की सजा के निलंबन के खिलाफ याचिका, 22 को होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हत्या के प्रयास के एक मामले में केरल उच्च न्यायालय द्वारा लोकसभा सांसद मोहम्मद फैजल की दोषसिद्धि और सजा के निलंबन के खिलाफ लक्षद्वीप प्रशासन की याचिका पर अंतिम सुनवाई के लिए 22 जुलाई की तारीख तय की है। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने शुरू में कहा कि उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड से ऐसा प्रतीत होता है कि सभी प्रासंगिक तथ्यों पर उचित विचार नहीं किया गया था और अधिक ध्यान उप-चुनाव के संचालन पर था, जो उनकी अयोग्यता का परिणाम है।

फैजल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने कहा कि इसी तरह के मामलों में शीर्ष अदालत के कई फैसले हैं और सजा के निलंबन के लिए निर्धारित मापदंडों में चुनाव भी शामिल है। पीठ ने सिंघवी से कहा, हमने पूरे रिकॉर्ड का अध्ययन किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि सभी प्रासंगिक तथ्यों पर उचित विचार नहीं किया गया। उच्च न्यायालय को इसकी दोबारा जांच करनी चाहिए।

यूटी प्रशासन की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि अगर मामले को वापस उच्च न्यायालय में भेजा जाता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। शिकायतकर्ता पदनाथ मोहम्मद सलीह, जिन पर 2009 में फैजल ने हमला किया था, की ओर से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि अगर मामला उचित विचार के लिए हाईकोर्ट को वापस भेजा जाता है तो उन्हें भी कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, सिंघवी ने कहा कि यह उचित होगा कि याचिका पर अंतिम फैसले के लिए शीर्ष अदालत सुनवाई करे। इसके बाद पीठ ने मामले को अंतिम सुनवाई के लिए 22 जुलाई को सूचीबद्ध किया।

सुप्रीम कोर्ट ने वीरप्पन के सहयोगी ज्ञानप्रकाश की जमानत की अवधि बढ़ाई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मारे गए चंदन तस्कर वीरप्पन के सहयोगी ज्ञानप्रकाश की अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ा दी। जिसे कर्नाटक में 1993 के पलार बम विस्फोट मामले में आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1987 (TADA ) के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने ज्ञानप्रकाश को दी गई राहत के अंतरिम आदेश को अगले आदेश तक जारी रखने का निर्देश दिया। 

27 साल से जेल में बंद ज्ञानप्रकाश (63) को उसकी पत्नी सेल्वा मैरी द्वारा दायर रिट याचिका पर स्वास्थ्य आधार पर 28 नवंबर, 2022 को अंतरिम जमानत दी गई थी।ज्ञानप्रकाश के वकील ने पीठ को सूचित किया कि वह जानलेवा बीमारी से पीड़ित हैं। कर्नाटक सरकार की ओर से अदालत में पेश वकील ने कहा कि उसकी हालत को देखते हुए राज्य ने ज्ञानप्रकाश को समय से पहले रिहा करने का फैसला किया है और इसके लिए गृह मंत्रालय को एक पत्र भेजा गया है।

उन्होंने यह भी कहा कि टाडा के दोषियों की सजा माफ करने पर आम तौर पर विचार नहीं किया जाता है। पीठ ने केंद्र की ओर से अदालत में पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से इस संबंध में निर्देश लेने को कहा। ट्रायल कोर्ट ने 2001 में ज्ञानप्रकाश को मौत की सजा सुनाई थी, लेकिन 2014 में शीर्ष अदालत ने सजा को उम्रकैद में बदल दिया था।

इंटरनेट की बहाली के लिए मणिपुर सरकार अपनी शिकायत हाईकोर्ट के समक्ष उठाए : SC

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मणिपुर सरकार से राज्य में इंटरनेट की सीमित बहाली पर उच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में पारित आदेश के संबंध में शिकायत उच्च न्यायालय के समक्ष उठाने को कहा। मणिपुर उच्च न्यायालय ने सात जुलाई को राज्य सरकार को इंटरनेट सेवाएं प्रदान करने की व्यवहार्यता की जांच करने के लिए भौतिक परीक्षण करने का निर्देश दिया था।

उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। उच्च न्यायालय 25 जुलाई को मामले की सुनवाई करेगा। जब मामला सोमवार को प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया तो मणिपुर सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्य में स्थिति बहुत संवेदनशील है और इंटरनेट प्रदान करना या न करना मौजूदा स्थिति पर निर्भर करता है।

पीठ ने याचिका को निस्तारित करते हुए कहा, "चूंकि मामला उच्च न्यायालय के पास है, इसलिए उसे ही इससे निपटने दें। हम आपको उच्च न्यायालय जाने की सलाह देंगे। कुछ भी हो, हम तो हैं ही।" पीठ में न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे। शीर्ष अदालत पहले उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ मणिपुर सरकार की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हुई थी।
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दिव्यांग व्यक्तियों के कल्याण के लिए बने कानून का अनुपालन सुनिश्चित करें, SC ने राज्यों को दिया निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग व्यक्तियों के लिए कल्याणकारी कानून के कार्यान्वयन को निराशाजनक करार देते हुए सोमवार को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) को निर्देश दिया कि वे 30 सितंबर तक दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 का अनुपालन सुनिश्चित करें। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कानून के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए मुख्य आयुक्त नियुक्त करने का भी निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून के कार्यान्वयन की स्थिति देश भर में निराशाजनक स्थिति की ओर इशारा करती है। यह अधिनियम विकलांग व्यक्तियों (पीडब्ल्यूडी) को रोजगार और अन्य कल्याणकारी उपायों में कोटा के अलावा समानता और गैर-भेदभाव का अधिकार प्रदान करता है। 

अदालत अधिनियम को लागू करके दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों को लागू करने से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इससे पहले अदालत ने केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को देश भर में अधिनियम के कार्यान्वयन के संबंध में जवाबी हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया था।

पीठ ने कहा, हम राज्य सरकारों को 30 सितंबर से पहले अधिनियम के प्रावधानों का शीघ्र अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं। मुख्य आयुक्तों की नियुक्ति 31 अगस्त तक की जानी है। पीठ ने आगे कहा कि केंद्रीय मंत्रालय को सभी राज्य सरकारों और संबंधित मंत्रालयों के साथ समन्वय करना होगा और एक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। मामले को आगे की कार्यवाही के लिए 18 सितंबर को सूचीबद्ध किया गया है।
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