सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उस ऑडियो क्लिप की शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले समिति से जांच कराने की मांग की गई थी, जिसमें तमिलनाडु के मंत्री पलानीवेल थियागा राजन को कथित तौर पर मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के परिवार द्वारा जमा की गई संपत्ति के बारे में टिप्पणी करते हुए सुना गया था।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, यह बिल्कुल फर्जी याचिका है... हम इसे राजनीतिक मंच के रूप में इस्तेमाल नहीं करेंगे। याचिका खारिज की जाती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि कुछ कार्रवाई योग्य सबूत होने चाहिए और संविधान के अनुच्छेद 32 (इसके तहत नागरिकों द्वारा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए सीधे शीर्ष अदालत में याचिका दायर की जा सकती है) के तहत इसके अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
पीठ ने कहा, कथित तौर पर एक ऑडियो क्लिप है जिसमें पूर्व वित्त मंत्री ने सीएम के परिवार का जिक्र किया है। इसका कोई साक्ष्यात्मक महत्व नहीं है। यह केवल अफवाह है। पीठ ने कहा, आपके पास आपराधिक कानून के तहत पर्याप्त उपाय हैं। इसे राजनीतिक मंच के रूप में उपयोग न करें। जनहित याचिकाकर्ता प्राणेश राजमणिक्कम ने आरोप लगाया कि कथित ऑडियो क्लिप के कारण वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल सेवा मंत्री थियागा राजन का वित्त विभाग बदल दिया गया।
पीठ ने कहा कि वह मंत्रियों के विभागों के बदलाव से संबंधित राजनीतिक फैसलों के पीछे नहीं जा सकती। राजमणिक्कम ने कहा कि तमिलनाडु के मतदाता के रूप में वह इस फैसले के पीछे का कारण जानने के हकदार हैं। पीठ ने केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला द्वारा ऑडियो क्लिप की जांच की मांग करने वाली दलीलों पर भी विचार नहीं किया। द्रमुक की कार्यप्रणाली की आलोचना करने वाले मंत्री के ऑडियो क्लिप पहले प्रतिद्वंद्वी भाजपा द्वारा जारी किए गए थे।
केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी परियोजना ‘प्रोजेक्ट चीता’ अहम मुश्किल का सामना कर रही है क्योंकि अफ्रीका से लाकर बसाए गए चीतों की त्वचा पर सर्दी से बचने के लिए मोटी ‘फर’ विकसित हो रही है और ऐसा अफ्रीकी सर्दी के मौसम के आने के उनके पूर्वानुमान की वजह से है। यह जानकारी सरकार ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय को दी। अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि यह प्रक्रिया ऐसे समय में हो रही है जब कुनो राष्ट्रीय उद्यान (केएनपी) का तापमान 45-46 डिग्री है। गौरतलब है कि इन चीतों को केएनपी में बसाया गया है।
इस साल मार्च से अब तक मध्यप्रदेश के केएनपी में नौ चीतों की मौत हो चुकी है जिनमें भारत में पैदा हुए तीन शावक भी शामिल हैं जिसके बाद परियोजना के प्रबंधन पर सवाल खड़े हो गए हैं। न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ के समक्ष सुनवाई के शुरुआत में भाटी ने कहा कि कुनो में चीतों की मौत समस्या है, लेकिन यह चेतावनी के स्तर पर नहीं है।
न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की ओर से पेश हुए भाटी से कहा, 20 चीतों को स्थानांतरित करने के मद्देनजर उनकी मौत की संख्या कम नहीं है। आपके तर्क का एक पहलू ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सबकुछ ठीक है और कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन आम जनता इस बात को लेकर चिंतित है कि इन मौतों पर क्या किया जा रहा है।
शीर्ष अदालत ने दक्षिण अफ्रीका के चार वन्य जीव विशेषज्ञों के पत्र पर संज्ञान लिया जिन्होंने कहा है कि कुछ चीतों की मौत को बेहतर निगरानी और पशु चिकित्सा से रोका जा सकता था। खबरों के मुताबिक विशेषज्ञों ने कथित तौर पर कहा कि उनकी राय को परियोजना परिचालन समिति ने नजरअंदाज किया और उन्होंने कुछ उपचारात्मक कदम के भी सुझाव दिए हैं। पीठ ने भाटी के इस तर्क को संज्ञान में लिया कि केएनपी में चीतों की मौत को रोकने के लिए विशेषज्ञों से सलाह ली जा रही है और जिस पत्र के बारे में कहा जा रहा है कि चार विशेषज्ञों ने लिखा है, उसपर केवल एक विशेषज्ञ का हस्ताक्षर है।
पीठ ने कहा, हमें भारत सरकार के अधिवक्ता पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है। बेहतर है कि इस मामले को विशेषज्ञों पर छोड़ दिया जाए क्योंकि अदालत मामले का विशेषज्ञ नहीं है। समिति में किसी विशेषज्ञ की जरूरत संबंधी विषय पर विचार करना केंद्र सरकार का काम है। यह अदालत किसी विशेषज्ञ को समिति में शामिल नहीं करेगी।
कुछ विशेषज्ञों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत चंद्र सेन ने कहा कि यह आपात स्थिति है और एमके रंजीत सिंह और वाईबी झाला जैसे विशेषज्ञों को परियोजना के लिए चीतों के विशेषज्ञ समिति में शामिल किया जाना चाहिए। पीठ ने सवाल किया कि वह कैसे किसी खास व्यक्ति को विशेषज्ञों की समिति में शामिल करने का निर्देश दे सकती है, जब पहले ही दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया के विशेषज्ञ शामिल हैं।
अदालत ने कहा, सिर्फ इसलिए की आप विशेषज्ञ हैं और आपको सीमिति में शामिल होना हैं? माफ करिए, ऐसा नहीं किया जा सकता। पहले ही पर्याप्त विशेषज्ञ समिति में शामिल हैं। भाटी ने अदालत को बताया कि ‘प्रोजेक्ट चीता ’ के तहत चीता प्रजाति का अंतर महाद्वीपीय स्तर पर स्थानांतरण दुनिया में अपनी तरह की पहली कोशिश है। उपलब्धता के आधार पर अगले पांच साल में हर साल 12 से 14 चीतों का स्थानांतरण किया जाना है। उन्होंने कहा कि कई मीडिया खबरों में चीतों के बारे में गलत जानकारी दी गई है और इससे बहुत भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई है। उन्होंने बताया कि प्रोजेक्ट चीता की नियमित जानकारी देने के लिए व्यवस्था बनाने पर विचार किया जा रहा है।
भाटी ने कहा, किसी भी चीते की मौत शिकार किए जाने, जहर देने, सड़क दुर्घटना, बिजली का करंट लगने आदि से नहीं हुई है। चीता बहुत ही संवेदनशील प्रजाति है। प्रोजेक्ट चीता सकारात्मक रूप से आगे बढ़ रहा है। गौरतलब है कि ‘प्रोजेक्ट चीता’ के तहत, सितंबर, 2022 और इस साल फरवरी में दो खेप में नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से केएनपी में कुल 20 चीतों को लाया गया था। उच्चतम न्यायालय ने जनवरी 2020 में एनटीसीए द्वारा दायर एक याचिका के बाद परियोजना पर 2013 में लगाए गए प्रतिबंध को हटा लिया था। अदालत परियोजना की निगरानी जारी रखे हुए है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पंजाब और उत्तर प्रदेश सरकारों के खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। याचिका में राज्यों में कार्यवाहक पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति करके शीर्ष अदालत के निर्देशों का कथित उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया था। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि अवमानना याचिका के बजाय, कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति को चुनौती देते हुए एक नई याचिका दायर की जानी चाहिए थी।
पीठ ने अवमानना याचिका दायर करने वाले वकील ब्रजेश सिंह से कहा, निपटाए गए मामले में अवमानना याचिका दायर करने की यह कौन सी प्रथा है? कृपया नई याचिका दायर करें... जब मामला तय हुआ तो आप पक्षकार नहीं थे। उन्होंने कहा कि पंजाब और यूपी दोनों ने शीर्ष अदालत के निर्देशों की पूरी तरह अवहेलना करते हुए नियमित राज्य पुलिस प्रमुखों के बजाय कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त किए हैं।
उन्होंने कहा, दोनों राज्यों में कार्यवाहक डीजीपी एक वर्ष से अधिक समय से पद पर हैं। यहां यह उल्लेख करना उल्लेखनीय है कि पंजाब के मामले में वर्तमान डीजीपी एक वर्ष से अधिक समय से पद पर हैं। और यूपी में एक वर्ष में तीन कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त किया गए हैं। उन्होंने आगे कहा कि राज्य ने प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन न करके अवमानना की है। वकील ने याचिका में यूपीएससी अध्यक्ष को भी पक्षकार बनाया था। गौरव यादव और विजय कुमार वर्तमान में क्रमशः पंजाब और यूपी के डीजीपी के रूप में कार्यरत हैं।
प्रकाश सिंह मामले में 2006 में शीर्ष अदालत के फैसले में कहा गया था कि राज्य का एक नियमित डीजीपी वही होगा जिसे राज्य सरकार द्वारा विभाग के तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से चयन किया गया हो, जिन्हें पुलिस बल का नेतृत्व करने के लिए उनकी सेवा अवधि, बहुत अच्छे रिकॉर्ड और अनुभव की सीमा के आधार पर यूपीएससी द्वारा उस रैंक पर पदोन्नति के लिए सूचीबद्ध किया गया हो। साथ ही कहा गया था कि और एक बार जब किसी व्यक्ति को नौकरी के लिए चुना जाता है, तो सेवानिवृत्ति की तारीख के बावजूद उनका न्यूनतम कार्यकाल कम से कम दो वर्ष होना चाहिए।