एल्गार परिषद-माओवादी लिंक मामले में आरोपी कार्यकर्ता गौतम नवलखा ने अपना पता बदलने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए को चार हफ्ते में जवाब देने को कहा है। बता दें कि गौतम नवलखा फिलहाल मुंबई पब्लिक लाइब्रेरी में नजरबंद हैं। याचिका में मांग की गई है नवलखा को सार्वजनिक पुस्तकालय से किसी अन्य जगह स्थानांतरित कर दिया जाए। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ को गौतम नवलखा के वकील ने बताया कि अप्रैल में भी सर्वोच्च अदालत ने एनआईए से जवाब मांगा था लेकिन अभी तक जवाब नहीं दिया गया है।
एल्गार परिषद मामले में गौतम नवलखा मुंबई की तालोजा जेल में बंद थे लेकिन उनकी बिगड़ती सेहत के चलते 10 नवंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने नवलखा को घर में नजरबंद रखने का आदेश दिया था। हालांकि एनआईए ने गौतम नवलखा के घर में नजरबंदी का विरोध किया था। बता दें कि कोर्ट ने गौतम नवलखा को घर में नजरबंदी के दौरान तैनात पुलिसकर्मियों के खर्चे के तौर पर 2.4 लाख रुपये जमा करने का आदेश दिया था। पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने नवलखा को पुलिसकर्मियों के खर्चे के तौर पर आठ लाख रुपये और जमा करने का निर्देश दिया था। बता दें कि 31 दिसंबर 2017 को पुणे में आयोजित हुए एल्गार परिषद के कार्यक्रम में भड़काऊ बयानबाजी की गई, जिसके चलते अगले दिन कोरेगांव भीमा युद्ध स्मारक के करीब हिंसा भड़क गई थी।
लद्दाख स्वायत्त विकास परिषद में चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर फैसला सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने 'लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद' के लिए 10 सितंबर को होने वाले चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस के उम्मीदवारों को 'हल' के चुनाव चिन्ह देने से इनकार किए जाने को चुनौती देने वाली पार्टी की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट छह सितंबर को फैसला सुनाएगा। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने केंद्र शासित प्रशासन और राजनीतिक दलों की ओर से पेश वकीलों की दलीले सुनकर फैसला सुरक्षित कर लिया है।
जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रशासन और निर्वाचन आयोग की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने दलील दी कि चुनाव चिन्ह आदेश, 1968 विधानसभा और संसदीय चुनाव पर लागू होता है न कि स्थानीय निकाय चुनावों में। वहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से पेश वकील ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की दलीलों का विरोध किया और कहा कि उनकी पार्टी लद्दाख पर्वतीय परिषद में सत्ता में थी और उनके उम्मीदवारों को आरक्षित चुनाव चिन्ह के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।