सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को प्री-कंसेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स एक्ट (पीसीपीएनडीटी एक्ट) के प्रावधानों और संबंधित नियमों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर सभी राज्यों से जवाब मांगा। पीसीपीएनडीटी कानून भ्रूण के लिंग निर्धारण के लिए प्रसवपूर्व निदान तकनीकों के उपयोग पर रोक लगाने के इरादे से बनाया गया था। जस्टिस एएस बोपन्ना और एमएम सुंदरेश की पीठ ने सभी राज्यों को नोटिस जारी किया और छह सप्ताह के भीतर उनका जवाब मांगा।
याचिकाकर्ता वकील शोभा गुप्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील पिंकी आनंद ने कहा कि कानून को अक्षरश: लागू नहीं किया जा रहा है और जैसा कि अधिनियम के तहत अनिवार्य है। राज्यों में अधिकारियों को नियुक्त करने की आवश्यकता है जो नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा, इस अदालत ने केवल केंद्र को नोटिस जारी किया है, लेकिन राज्य को कोई नोटिस जारी नहीं किया गया। राज्यों को अदालत को बताना होगा कि उचित प्राधिकारियों की नियुक्ति क्यों नहीं की गई है।
आनंद ने कहा कि अधिनियम के तहत बनाए गए संबंधित नियम यह कहते हैं कि कानून के तहत बरी किए जाने के किसी भी आदेश के खिलाफ अपील दायर की जानी चाहिए, जिसका उद्देश्य अजन्मे बच्चों को बचाना है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा अधिनियम के तहत अधिकारियों की नियुक्ति न करने की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, हमने जो आंकड़े प्राप्त किए हैं, वे संकेत देते हैं कि बरी होने के बाद कोई अपील दायर नहीं की गई है और संबंधित अधिकारियों द्वारा आवश्यक कार्रवाई नहीं की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका खारिज कर दी। दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था, जिसमें राज्य से एक आईपीएस अधिकारी के वहां से राजस्थान कैडर स्थानांतरण से संबंधित मामले में अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) देने के लिए कहा गया था।
पश्चिम बंगाल कैडर के 2019 बैच के आईपीएस अधिकारी सागर ने राज्य से राजस्थान कैडर में परिवर्तन के लिए न्यायाधिकरण में इस आधार पर याचिका दायर की थी कि उनकी पत्नी भी राजस्थान कैडर की आईपीएस अधिकारी हैं और इस तरह पदस्थापित कपल को कैडर बदलने की अनुमति है। इस साल फरवरी में पारित एक आदेश में नई दिल्ली में ट्रिब्यूनल की प्रधान पीठ ने पश्चिम बंगाल कैडर के आईपीएस अधिकारी द्वारा दायर मूल आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया था और राज्य को चार सप्ताह के भीतर उन्हें एनओसी देने का निर्देश दिया था और कहा था कि अगर इस दौरान एनओसी जारी नहीं किया जाता है तो इसे जारी किया हुआ माना जायेगा।
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा था कि केंद्र चार सप्ताह के भीतर उचित आदेश पारित करके उनके कैडर को पश्चिम बंगाल से राजस्थान स्थानांतरित करने के लिए तत्काल कार्रवाई करेगा। इसके बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने इस साल 15 मार्च को एक आदेश पारित कर राज्य की याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि न्यायाधिकरण के आदेश में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसके बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया और याचिका गुरुवार को न्यायमूर्ति एसके कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई।
पीठ ने कहा, सरकारें कभी-कभी बहुत अनुचित होती हैं। आप केवल मुकदमेबाजी के लिए मुकदमा करते हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि अधिकारी शादी के आधार पर कैडर ट्रांसफर की मांग कर रहे हैं। पीठ ने कहा, यह बहुत ही अनुचित है। आप कहते हैं कि पत्नी को यहां (पश्चिम बंगाल) आने दें। पीठ ने पूछा, आप नहीं चाहते कि वे एक साथ रहें?
शीर्ष अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार गुरुवार से 10 दिनों के भीतर राहत देने का आदेश पारित करेगी, ऐसा नहीं करने पर इसे सहमति माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नजफगढ़ झील को पुनर्जीवित करने का मुद्दा उपराज्यपाल की अध्यक्षता वाली एक समिति को सौंपने के नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली सरकार से जवाब मांगा। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति संजय करोल की पीठ ने एक एनजीओ की ओर से दायर याचिका पर आप सरकार और अन्य को नोटिस जारी किया। मामले पर अगली सुनवाई 24 जुलाई को होगी। याचिकाकर्ता इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (आईएनटीएसीएच) ने कहा कि एनजीटी एनजीओ की ओर से उठाए गए मुद्दों पर विचार करने में विफल रही और मामले को प्रदूषण के एक साधारण मामले में बदल दिया। एनजीटी ने 16 फरवरी को आदेश जारी कर झील को पुनर्जीवित करने का मुद्दा उपराज्यपाल वीके सक्सेना की अध्यक्षता वाली समिति को सौंप दिया था। इस आदेश के खिलाफ आईएनटीएसीएच ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
हाथी अरिक्कोंबन के स्वास्थ्य पर रिपोर्ट देने संबंधी याचिका पर विचार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केरल के चावल खाने वाले हाथी अरिक्कोंबन के स्वास्थ्य और गतिविधि पर विस्तृत रिपोर्ट की मांग करने वाली याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने पशु अधिकार समूह वॉकिंग आई फाउंडेशन फॉर एनिमल एडवोकेसी पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। पीठ ने कहा, अरिक्कोंबन पर अब और कुछ नहीं। हम इस ‘अरिक्कोंबन’ से परेशान हो चुके हैं। आप केरल हाईकोर्ट जाएं। वह जमीनी हकीकत से अवगत हैं। हर हफ्ते हमें एक याचिका मिल रही है कि इस हाथी को कहीं और रखा जाए। यह सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। पशु अधिकार संस्था ने हाथी के स्वास्थ्य के संबंध में एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। केरल में चावल और राशन की दुकानों पर उत्पात मचाने वाले अरिक्कोंबन को पिछले महीने राज्य के पेरियार टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित कर दिया गया था।