सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नृशंस हत्या के दोषियों के लिए सजा की अवधि का निर्धारण करते समय हत्या की संख्या, मृतकों की उम्र और लिंग, चोटों की प्रकृति, अपराध के दौरान यौन हमला जैसे कुछ गंभीर तथ्यों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने ऐसे मामलों में दोषियों के लिए कारावास की अवधि तय करने और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं। जस्टिस केवी विश्वानथन की पीठ ने केरल में 11 वर्ष से 80 वर्ष की आयु वर्ग की तीन लड़कियों व महिलाओं सहित चार व्यक्तियों की हत्या के दोषी नवास को 25 साल कैद की सजा सुनाते हुए ये दिशानिर्देश जारी किए।
इन तथ्यों का रखें ध्यान
पीठ ने दुर्लभतम की श्रेणी में नहीं आने वाले अपराध में दोषियों के लिए उचित सजा की गणना करने के लिए अदालतों को कुछ तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए, ताकि मौत की सजा से बचे दोषियों को कड़ी सजा हो सके। मसलन, हत्या की संख्या, मारे गए व्यक्तियों की उम्र और लिंग; चोटों की प्रकृति और क्या अपराध के दौरान यौन हमला हुआ आदि। साथ ही अपराध के पीछे का मकसद, क्या अपराध तब किया गया था जब अभियुक्त किसी अन्य मामले में जमानत पर था, क्या यह पूर्व नियोजित था, अपराधी और पीड़ितों के बीच संबंध और विश्वास का दुरुपयोग, दोषी का आपराधिक इतिहास, क्या समय से पहले रिहाई पर दोषी समाज के लिए खतरा तो नही होगा आदि पर भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
अपराधी के आचरण पर भी करें गौर
दोषी की सजा कम करने के पक्ष पर पीठ ने कहा कि अदालतों को इस बात की जांच करनी चाहिए कि क्या अपराधी ने हत्याएं करने पर पछतावा व्यक्त किया। साथ ही अपराधी की उम्र और जेल में रहते हुए उसके आचरण पर गौर किया जाना चाहिए। मौजूदा मामले में यह पाया गया कि दोषी को जेल अधीक्षक से अच्छा आचरण प्रमाण पत्र मिला था। यह देखते हुए पीठ ने हाई कोर्ट द्वारा दोषी को दी गई 30 साल की सजा को घटाकर बिना छूट के 25 साल कैद में बदल दिया।