सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में यौन अपराधों के मामलों में अदालतों के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करते हुए कहा है कि जजों को महिलाओं के बारे में रूढ़िवादी या पितृसत्तात्मक सोच से बचना चाहिए। कोर्ट ने देश की सभी अदालतों को यौन अपराध से जुड़े मामलों का निपटारा करते वक्त महिलाओं के वस्त्र, उनके आचरण, पूर्व बर्ताव व नैतिकता का पाठ पढ़ाने से परहेज करने के लिए कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जजों को हर वक्त इसके प्रति संवेदनशील रहना चाहिए कि ऐसा कोई भी शब्द या बात, बोली या लिखी नहीं जानी चाहिए, जिससे पीड़िता की पवित्रता और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती हो।
जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने ये बातें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को दरकिनार करते हुए कही हैं, जिसमें यौन उत्पीड़न के आरोपी को पीड़िता से राखी बंधवाने की शर्त पर जमानत दी गई थी। पीठ ने अपने आदेश में कहा है कि जमानत के लिए पीड़िता से राखी बंधवाने की शर्त स्वीकारयोग्य नहीं है। यह शर्त छेड़छाड़ करने वाले को भाई बना देती है। ऐसा करना यौन उत्पीड़न के अपराधों को कमतर करके देखने के समान है। पीठ ने कहा, यौन उत्पीड़न इतना छोटा अपराध नहीं है कि अपराधियों को माफी, सामुदायिक सेवा करवाना, पीड़िता से राखी बंधवाना या शादी के लिए वादा करने के लिए कहा जाए। यह नाबालिग द्वारा किया गया पाप नहीं है कि उसे सामाजिक सेवा करवाकर या राखी बांधने का आदेश देकर या उपहार दिलवा कर या शादी का वादा करवा कर या माफी मंगवाकर रास्ता निकाला जाए। पीठ ने कहा, कानून के तहत महिला की अस्मिता से खिलवाड़ करना अपराध है। ऐसा कोई भी तर्क या भाषा जो अपराध को कमतर करती हो और पीड़िता की अहमियत को कम करती हो, किसी भी हालत में ऐसे आदेश देने से बचना चाहिए।
ऐसी शर्तें लगाना पीड़िता के लिए सदमा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में किसी मामले का निपटारा करने में पीड़िता का पूर्व आचरण और कृत्य अप्रासंगिक है। मसलन, जैसे पीड़िता ने पूर्व में गलत कृत्य करने की सहमति दी हो या ऐसे कपड़े पहने हो, जिससे आरोपी में उत्तेजना आई हो। कोर्ट ने कहा है कि इस तरह की विवेचना अदालती आदेश का हिस्सा नहीं होना चाहिए और यह आरोपी के लिए जमानत का आधार नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने कहा है कि इस तरह की शर्त लगाना पीड़िता के लिए सदमा है।
जजों की भूमिका शिक्षक और विचारक की, समझौते का न दें सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि जजों की भूमिका अहम होती है। वे शिक्षक और विचारक की भूमिका निभाते हैं। अदालत द्वारा आरोपी व पीड़िता को सुलह या समझौता का सुझाव नहीं दिया जाना चाहिए।
विधि के पाठ्यक्रम में शामिल करें लैंगिक संवेदनशीलता
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि हर जज को मौलिक प्रशिक्षण के तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता पर प्रशिक्षण देने का मॉड्युल विकसित किया जाना चाहिए। साथ ही बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया है कि वह एलएलबी पाठ्यक्रम में इसे शामिल करें और ऑल इंडिया बार परीक्षा में भी इसे जगह दें।
रूढ़िवादी सोच के 12 उदाहरण देकर कहा, इनसे परहेज करें
जस्टिस रवींद्र भट द्वारा लिखे गए इस फैसले में रूढ़िवादी सोच के 12 उदाहरण दिए हैं। इसमें कहा गया है कि आदेश में ऐसा कुछ भी नहीं लिखना चाहिए जो रूढ़िवादी सोच हो। मसलन, महिलाएं शारीरिक तौर पर कमजोर होती हैं ऐसे में उन्हें संरक्षण चाहिए। महिलाएं खुद फैसले लेने में सक्षम नहीं होती हैं, आदमी घर का मुखिया होता है और परिवार का फैसला वही लेता है। संस्कृति के तहत महिलाओं को समझौता करना चाहिए क्योंकि वह ज्यादा अनुशासित होती हैं। अच्छी महिलाएं वह होती हैं जो पवित्र होती हैं। महिलाओं पर ही बच्चों की जिम्मेदारी होती है। अगर रात में अकेली हैं या ऐसे कपडे़ पहनती हैं तो वह अपने ऊपर हमले के लिए खुद जिम्मेदार हैं। अगर वह शराब पीती हैं या धूम्रपान करती हैं तो किसी आदमी को बुरे व्यवहार के लिए खुद न्योता देती हैं। अगर शारीरिक विरोध नहीं है तो इसका मतलब सहमति से है। ये तमाम घिसी-पिटी रूढ़िवादी बातों को आदेश में लिखने से अदालतों को परहेज करना चाहिए।
पीड़िता को संरक्षण दिया जाना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि यौन अपराध के मामलों में जमानत की कोई भी शर्त ऐसी न हो, जिससे कि आरोपी और पीड़िता का आमना-सामना हो। पीड़िता को संरक्षण दिया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उसे और प्रताड़ित न होना पडे़। जब भी ऐसे मामलों में जमानत दी जाए तो पीड़िता को इस बारे में जानकारी दी जाए। जमानत की शर्तें सीआरपीसी के मुताबिक हों।
यह है मामला
दरअसल, मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने गत वर्ष जुलाई में छेड़छाड़ के एक आरोपी को इस शर्त पर जमानत दी थी, वह पत्नी के साथ तीन अगस्त को राखी और मिठाई लेकर शिकायतकर्ता के घर जाएगा। साथ ही राखी बंधवाने के एवज में शिकायतकर्ता को 11 हजार रुपये भी देने के लिए कहा था। हाईकोर्ट के इस आदेश को अपर्णा भट्ट समेत नौ महिला वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।