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Supreme Court: कोर्ट ने अल्पसंख्यक स्कूलों को RTE से छूट देने वाले फैसले पर जताया संदेह, CJI के पास भेजा मामला

Mon, 01 Sep 2025 04:19 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के प्रमाटी फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई एक्ट से छूट देना सही नहीं हो सकता। कोर्ट ने यह मामला सीजेआई को भेजा है ताकि तय किया जा सके कि फैसले की समीक्षा होनी चाहिए या नहीं। साथ ही, कोर्ट ने साफ किया कि सभी शिक्षकों को टीईटी पास करना जरूरी है। जिनकी सेवा पांच साल से कम बची है, उन्हें रिटायरमेंट तक छूट दी गई है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2014 के प्रमाटी एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट मामले के उस फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसमें कहा गया था कि अल्पसंख्यक स्कूलों को बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने वाले कानून (आरटीई एक्ट, 2009) से छूट है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि उन्हें इस फैसले की सही होने पर संदेह है और उन्होंने यह मुद्दा मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के पास भेज दिया है।
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आरटीई एक्ट के तहत छह से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है। कानून में प्रावधान है कि निजी स्कूलों को 25 प्रतिशत सीटें कमजोर वर्गों और वंचित तबकों के बच्चों के लिए सुरक्षित रखनी होंगी। लेकिन 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रमाटी केस में यह कहा था कि अल्पसंख्यक स्कूलों को इस प्रावधान से छूट दी जाएगी। मौजूदा पीठ ने सवाल उठाया कि क्या यह छूट सही है और क्या इसे दोबारा विचार की जरूरत है।

न्यायालय की विस्तृत टिप्पणियां
पीठ ने कहा कि अगर आरटीई एक्ट अल्पसंख्यकों के अधिकारों (अनुच्छेद 30) का उल्लंघन करता है, तो प्रमाटी फैसले में यह विचार करना चाहिए था कि धारा 12(एक)(c) को उस समुदाय के कमजोर तबके के बच्चों तक सीमित कर पढ़ा जा सकता था। अदालत ने कहा कि पूरी तरह छूट देना सही नहीं था। इसलिए, यह तय करने की जरूरत है कि क्या पुराने फैसले की समीक्षा होनी चाहिए। पीठ ने चार अहम मुद्दों पर फैसला मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा है।
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सीजेआई के पास भेजे गए सवाल
  1. क्या प्रमाटी फैसले की दोबारा समीक्षा होनी चाहिए।
  2. क्या धारा 12(एक)(c) को अल्पसंख्यक स्कूलों में उनके ही समुदाय के कमजोर बच्चों तक सीमित किया जा सकता है।
  3. प्रमाटी केस में अनुच्छेद 29(दो) पर विचार न करने का प्रभाव।
  4. धारा 23(दो) पर विचार न करने का प्रभाव और क्या केवल धारा 12(एक)(c) ही नहीं बल्कि पूरा आरटीई एक्ट असंवैधानिक घोषित होना चाहिए।

शिक्षकों और टीईटी को लेकर फैसला
इसी सुनवाई में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि 29 जुलाई 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर भी यह लागू होगा। हालांकि, जिनके पास पांच साल से कम सेवा बची है, उन्हें बिना टीईटी पास किए सेवानिवृत्ति तक काम करने दिया जाएगा। लेकिन प्रमोशन के लिए उन्हें भी टीईटी पास करना होगा। वहीं जिनके पास पांच साल से ज्यादा सेवा बाकी है, उन्हें दो साल में टीईटी पास करना अनिवार्य होगा। असफल होने पर उन्हें सेवा से हटाकर रिटायर कर दिया जाएगा।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि किसी शिक्षक ने सेवा अवधि पूरी की है, तो उन्हें रिटायरमेंट लाभ मिलेगा। जिनकी सेवा अवधि अधूरी है, उनकी स्थिति शिक्षा विभाग विचार करेगा। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था अनुच्छेद 142 के तहत दी गई है ताकि न्याय और संतुलन बना रहे।

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आरटीई फंडिंग विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार की अपील
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तमिलनाडु सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसमें निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को राइट टू एजुकेशन (RTE) अधिनियम के तहत समय पर प्रतिपूर्ति करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र और हाईकोर्ट के याचिकाकर्ता से जवाब मांगा और मामले को चार हफ्ते बाद के लिए सूचीबद्ध कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि आरटीई लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और केंद्र से फंड न मिलना कोई आधार नहीं हो सकता।

अदालत ने केंद्र से भी अपने दायित्व निभाने और फंडिंग को समग्र शिक्षा योजना से अलग करने पर विचार करने का निर्देश दिया था। राज्य सरकार का तर्क है कि निजी स्कूल प्रबंधनों को प्रतिपूर्ति मिलनी चाहिए और यह जिम्मेदारी केंद्र और राज्य दोनों की साझा होनी चाहिए। वहीं, केंद्र ने हाईकोर्ट में कहा था कि एनईपी 2020 के तहत समग्र शिक्षा योजना एकीकृत ढांचा है और कानून के मुताबिक राज्यों की प्रमुख जिम्मेदारी है कि वे आरटीई को लागू करें।

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