व्यभिचार यानी एडल्टरी (धारा-497) को अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए या नहीं, इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस मामले में 27 मई, 1985 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस यशवंत विष्णु (वाईवी) चंद्रचूड़ ने धारा-497 को वैध करार देने का फैसला सुनाया था और विवाहेत्तर संबंधों के अपराध में महिलाओं को भी पुरुषों के समान दोषी ठहराए जाने की याचिका खारिज कर दी थी। लेकिन अब उन्ही के बेटे और सुप्रीम कोर्ट के जज धनंजय (डीवाई) चंद्रचूड़ अपने पिता के फैसले को पलटने की ओर अग्रसर हैं।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसमें जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भी सदस्य के रूप में शामिल हैं। कोर्ट ने गुरूवार को व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से हटाने के स्पष्ट संकेत दिए हैं।
कोर्ट ने कहा है कि शादी की पवित्रता बनाए रखने के लिए पति और पत्नी दोनों एक समान रूप से जिम्मेदार हैं। सिर्फ पति को व्यभिचार के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने आश्चर्य जताया कि अगर शादीशुदा महिला अपने पति के अलावा किसी अन्य शादीशुदा पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाती है तो ऐसे में सिर्फ पुरुष पर ही अपराध क्यों बनता है जबकि महिला भी अपराध के लिए उतनी ही जिम्मेदार है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि सरकार की यह दलील कि विवाह की पवित्रता बनाए रखने के लिए व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में होना ही चाहिए, यह उचित नहीं लगता। यह कैसा कानून है कि अगर शादीशुदा पुरुष विवाहित महिला के साथ संबंध बनाता है तो कोई अपराध नहीं बनता। शादी की पवित्रता जरूर एक मसला है लेकिन व्यभिचार में दंडात्मक प्रावधान होना समानता के अधिकार का उल्लंघन प्रतीत होता है क्योंकि यह शादीशुदा मर्द और शादीशुदा महिला को अलग-अलग नजरिए से देखता है।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इस कानून को महिलाओं के सम्मान के खिलाफ बताया है और कहा कि धारा-497 महिलाओं को पतियों की चल संपत्ति समझती है। उन्होंने कहा कि 1985 का फैसला उस समय के हिसाब से प्रासंगिक था, लेकिन हमें अपने फैसलों को आज के हिसाब से प्रासंगिक बनाना होगा।
यह पहली बार नहीं है कि जस्टिस चंद्रचूड़ अपने पिता के फैसले को बदलने जा रहे हैं। इससे पहले भी 1976 में आपातकाल के दौरान अपने पिता वाईवी चंद्रचूड़ द्वारा सुनाए गए फैसले को पलट दिया था। वाईवी चंद्रचूड़ के फैसले में इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा आपातकाल के दौरान 'राइट टू लाइफ' के अधिकार को निरस्त करने के फैसले का समर्थन किया गया था। जबकि डीवाई चंद्रचूड़ ने उस फैसले को पलट दिया और कहा कि चार जजों का बहुमत वाला फैसला खामियों से भरा हुआ था।