सुप्रीम कोर्ट ने करनाल में भाजपा कार्यालय के लिए बनाई गई एक्सेस रोड पर सख्त रुख अपनाते हुए हरियाणा सरकार को बड़ा निर्देश दिया है। अदालत ने साफ कहा कि जहां 40 बड़े पेड़ काटे गए, उस हरी जमीन को तीन महीने में अपनी पुरानी स्थिति में बहाल किया जाए। यह मामला एक 1971 युद्ध के पूर्व सैनिक की याचिका से जुड़ा है, जिसने पेड़ों की कटाई और जमीन आवंटन को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के वी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि पेड़ अवैध तरीके से काटे गए हैं और यह हरित क्षेत्र से खिलवाड़ है। पीठ ने अधिवक्ता भूपेंद्र प्रताप सिंह की दलीलों से सहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि भाजपा कार्यालय तक पहुंच बनाने के लिए हरे क्षेत्र को नुकसान पहुंचाया गया। कोर्ट ने यह भी माना कि सरकार की ओर से पेश किए गए दस्तावेज यह साबित नहीं करते कि प्रक्रिया कानून के अनुसार हुई।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने अदालत को बताया कि पेड़ों की कटाई के बदले नए पेड़ लगाए जाएंगे, लेकिन अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई। कोर्ट ने पहले ही 26 नवंबर को हरियाणा सरकार को फटकार लगाते हुए इस पूरे काम को “बेहद खराब” बताया था। अदालत ने राज्य को चेतावनी भी दी थी कि अगर जल्द समाधान नहीं दिया गया, तो सरकार को कड़ा सामना करना पड़ेगा। याचिकाकर्ता कर्नल (सेवानिवृत्त) दविंदर सिंह राजपूत, जो 1971 युद्ध में वीर चक्र से सम्मानित हो चुके हैं, ने दावा किया कि उनकी प्लॉट के बगल की जमीन को गलत तरीके से भाजपा को आवंटित किया गया। उन्होंने कहा कि यह जमीन संस्थागत उपयोग के लिए नहीं थी और न ही इसे नौ मीटर चौड़ी सड़क पर स्थित किसी राजनीतिक दल को दिया जा सकता था। राजपूत ने यह भी बताया कि उन्होंने हरे क्षेत्र की ओर प्लॉट होने के लिए 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क 36 साल पहले भरा था।
राजपूत ने अपनी याचिका में कहा कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उनके अधिकारों की अनदेखी करते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी थी। उन्होंने बताया कि जमीन आवंटन के नियमों के अनुसार, किसी संस्थागत साइट को कम से कम 24 मीटर चौड़ी सड़क पर होना चाहिए, जबकि जिस जमीन को आवंटित किया गया वह सिर्फ नौ मीटर चौड़ी सड़क पर स्थित थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन बिंदुओं पर गंभीर सवाल उठाए और पूरी प्रक्रिया पर संदेह जताया। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण और करनाल नगर निगम को तीन महीने के भीतर हरी जमीन को उसकी मूल स्थिति में वापस लाने का आदेश दिया। हालांकि अदालत ने आवंटन की वैधता पर और जांच करने से यह कहते हुए इनकार किया कि अब इसे चुनौती देना देर हो चुकी है। अदालत ने पहले ही राज्य को स्टेटस-को बनाए रखने का निर्देश दिया था और यह भी कहा था कि आगे कोई विकास कार्य हुआ तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा।
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दिल्ली दंगों की साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर फैसला सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को फरवरी 2020 दिल्ली दंगों की ‘बड़ी साजिश’ से जुड़े यूएपीए मामले में कार्यकर्ता उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। उन्हें यूएपीए और पूर्ववर्ती आईपीसी की धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एएसजी एस वी राजू ने जमानत का कड़ा विरोध किया और कहा कि 2020 के दंगे अचानक नहीं हुए, बल्कि यह “पूर्व नियोजित और संगठित हमला" था जिसका उद्देश्य देश की संप्रभुता को चुनौती देना था। वहीं आरोपियों की ओर से कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी सहित वरिष्ठ वकीलों ने दलीलें रखीं। दिल्ली हाई कोर्ट ने 2 सितंबर को जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं, जिसके बाद आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। दंगे नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुए थे, जिनमें 53 लोगों की मौत और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।
ओडिशा खनन बकाया मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पास समर्पित पीठ बनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार को खनन बकाया वसूली से जुड़े मामलों के जल्द निपटारे के लिए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के समक्ष आवेदन देने की अनुमति दी है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि चूक करने वाले खनन पट्टेदारों से वसूली पर लगी रोक जैसे मामलों का अंतिम फैसला 31 मार्च 2026 तक होना चाहिए। अदालत खनन नियमों के उल्लंघन पर बकाया वसूली से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ को ओडिशा सरकार ने बताया कि हाईकोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें वसूली आदेशों को चुनौती दी गई है और अंतरिम रोक लगी हुई है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक राजस्व का बड़ा हिस्सा इससे जुड़ा है, इसलिए सभी ऐसे मामलों को हाईकोर्ट में एक समर्पित पीठ को सौंपा जाए। अदालत ने ओडिशा सरकार को 19 दिसंबर 2025 तक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने आवेदन दाखिल करने का निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि यदि 31 मार्च 2026 तक याचिकाओं पर अंतिम फैसला नहीं हो पाता, तो कम से कम राज्य की ओर से अंतरिम आदेश रद्द करने या संशोधित करने के लिए दाखिल अपीलों पर विचार किया जाए। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में तय की है और ओडिशा सरकार को 2 अप्रैल तक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। गौरतलब है कि 29 अक्टूबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार द्वारा बकाया वसूली के तरीके पर नाराजगी जताई थी। याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि कई मामलों में हाईकोर्ट ने वसूली कार्यवाही पर अंतरिम रोक दे रखी है, जबकि राज्य के वकील ने पुष्टि की कि 19 प्रमाणपत्र संबंधी मामले अभी लंबित हैं। अदालत को यह भी बताया गया कि बकाया राशि 31 दिसंबर 2017 तक जमा करनी थी, जिसे लेकर विवाद जारी है।
पीओएसएच मामलों में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: पीड़िता के विभाग की आईसीसी अन्य विभाग के आरोपी की शिकायत भी सुनेगी
सुप्रीम कोर्ट ने यौन उत्पीड़न निवारण (पीओएसएच) मामलों में अहम फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि पीड़िता के विभाग में गठित आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) दूसरे विभाग के कर्मचारी के खिलाफ भी शिकायत की सुनवाई कर सकती है। अदालत ने कहा कि कानून की संकीर्ण व्याख्या पीड़ित महिला के लिए अनावश्यक और व्यावहारिक बाधाएं खड़ी कर देगी तथा अधिनियम के सामाजिक कल्याणकारी उद्देश्य को कमजोर करेगी। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि पीओएसएच अधिनियम की धारा 11 में जहां प्रतिवादी एक कर्मचारी है का अर्थ यह नहीं है कि कार्यवाही सिर्फ आरोपी के विभाग की आईसीसी के समक्ष ही हो। ऐसा करना पीड़िता के लिए प्रक्रियात्मक और मानसिक दबाव बढ़ाएगा, क्योंकि उसे आरोपी के कार्यस्थल पर जाकर शिकायत दर्ज करानी पड़ेगी। अदालत ने यह भी कहा कि यदि पीड़िता के विभाग की आईसीसी तथ्य-खोज जांच कर रही है, तो आरोपी के नियोक्ता को अधिनियम की धारा 19(एफ) के तहत पूरा सहयोग करना होगा। इसमें आवश्यक दस्तावेज, जानकारी और समर्थन तुरंत उपलब्ध कराना शामिल है। शीर्ष अदालत ने दोहराया कि पीओएसएच का उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है और उसकी व्याख्या हमेशा पीड़ितोन्मुख होनी चाहिए।
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