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Supreme Court: 'गृहिणियां 'राष्ट्रनिर्माता', इनके घरेलू काम की कीमत ₹30 हजार प्रतिमाह'; किस केस में आया आदेश?

Thu, 11 Jun 2026 02:28 PM IST
अमन तिवारी एएनआई, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने सड़क हादसों में जान गंवाने वाली गृहिणियों (होममेकर्स) को 'राष्ट्र निर्माता' बताते हुए अहम फैसला सुनाया। अब मुआवजे के लिए उनके घरेलू काम की न्यूनतम कीमत ₹30,000 प्रति माह मानी जाएगी। 
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि सड़क हादसों में जान गंवाने वाली गृहिणियों के काम की कीमत कम से कम 30,000 रुपये महीना मानी जानी चाहिए। मुआवजे की गणना करते समय इस राशि को आधार करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा की कि गृहिणियों को राष्ट्र निर्माता के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
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देश भर में मोटर दुर्घटना के मामलों में मुआवजा तय करने के तरीके को बदलने वाले इस अहम फैसले में, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने होममेकर्स की काल्पनिक आय को कुशल मजदूरों की मजदूरी के बराबर मानने की पुरानी न्यायिक प्रथा को खारिज कर दिया। जिसमें गृहिणियों की आय को कुशल मजदूरों की दिहाड़ी के बराबर माना जाता था। 
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कोर्ट ने कहा कि घर के कामों की सामाजिक और आर्थिक अहमियत बहुत ज्यादा है। इसे केवल सामान्य मजदूरी के तराजू में नहीं तौला जा सकता। जस्टिस करोल ने फैसला सुनाते हुए कहा कि घरेलू देखभाल के नुकसान की भरपाई के लिए 30,000 रुपये का नया नियम बनाया गया है। यह राशि 'प्रणय सेठी' केस में तय किए गए अन्य लाभों के अतिरिक्त होगी।

यह मामला पंजाब की रेशमा नाम की महिला से जुड़ा है। उनकी मौत नवंबर 2001 में एक सड़क हादसे में हुई थी। उनके पति और तीन बच्चों ने मुआवजे के लिए ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था। ट्रिब्यूनल ने 2003 में फैसला दिया, लेकिन कानूनी लड़ाई वर्षों तक चलती रही। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस पर दिसंबर 2024 में फैसला सुनाया। हादसे के 23 साल बाद आए इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताई।

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सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मोटर एक्सीडेंट से जुड़े दावों का निपटारा आमतौर पर एक साल के भीतर हो जाना चाहिए। कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया कि वे ऐसे मामलों की निगरानी करें। उन्होंने उचित प्रशासनिक निर्देश जारी करने को कहा ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।

यह फैसला पूरे देश में मुआवजे के पुराने तरीकों को बदल देगा। अब तक अदालतें गृहिणियों की आय न्यूनतम मजदूरी के आधार पर तय करती थीं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि घर के काम को सामान्य लेबर मार्केट के पैमानों से नहीं मापा जा सकता। इससे पहले भी 'कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस' और 'अरुण कुमार अग्रवाल' जैसे मामलों में कोर्ट ने कहा था कि गृहिणियों का योगदान अमूल्य है। नया फैसला मुआवजे की राशि को काफी बढ़ा देगा और पीड़ितों को आर्थिक मजबूती देगा।
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