महिलाओं को प्रजनन की स्वायत्ता और गर्भपात का अधिकार देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले को परिवार स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने ऐतिहासिक बताया है। इनका कहना है कि इस निर्णय के बाद अब देश में असुरक्षित गर्भपात के मामलों में न सिर्फ कमी आएगी, बल्कि महिलाओं को सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी लाभ होगा।
कानून तोड़ा तो यह सजा
कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने के परिणाम गंभीर हो सकते हैं। उल्लंघन करने पर न्यूनतम दो वर्ष या अधिकतम सात वर्ष का कठोर कारावास हो सकता है।
ये भी चुनौतियां
ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित सेवा प्रदाताओं का अभाव, सेवा प्रदाताओं में संवेदनशीलता की कमी, स्वास्थ्य केंद्रों पर गोपनीयता और विश्वसनीयता का अभाव, अगर कोई किशोरी गर्भपात कराना चाहती है, तो उसे हीन दृष्टि से देखा जाना कुछ चुनौतियां हैं।
नोट : (सभी जानकारियां राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की आशा प्रशिक्षण पुस्तिका के अनुसार)
51 साल में एक संशोधन
भारतीय संसद ने 1971 में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट या एमटीपी कानून पारित किया था और 2021 में इसमें संशोधन हुआ। बनने के वक्त यह दुनिया के सबसे प्रगतिशील कानूनों में से एक था। इसकी मुख्य विशेषताएं गर्भपात के लिए गर्भ अवधि की अधिकतम सीमा 20 सप्ताह तक थी लेकिन संशोधित अधिनियम 2021 में इस अवधि को 24 सप्ताह किया गया है।
जबरदस्ती गर्भधारण से बचाने के लिए अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट के तहत महिलाओं को जबरदस्ती गर्भधारण से बचाने के लिए वैवाहिक दुष्कर्म को ‘दुष्कर्म’ के दायरे में माना जाना चाहिए।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने गर्भपात से संबंधित अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा, भारतीय दंड संहिता के तहत वैवाहिक दुष्कर्म को भले ही अपवाद के रूप में रखा गया हो, इसके बावजूद गर्भवती महिला यदि बलपूर्वक होने वाली गर्भावस्था की शिकायत करती है तो इस संबंध को ‘दुष्कर्म’ माना जाना चाहिए।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि एमटीपी अधिनियम के तहत वैवाहिक दुष्कर्म को ‘दुष्कर्म’ समझना आईपीसी की धारा- 375 के अपवाद- 2 को खत्म करना या आईपीसी में परिभाषित दुष्कर्म के अपराध की रूपरेखा को बदलना नहीं है। धारा 375 के तहत वैवाहिक दुष्कर्म को आपराधिक नहीं माना गया है।
पीठ ने कहा, यह केवल एमटीपी कानून और उसके तहत बने किसी भी नियम और विनियम के प्रयोजनों तक सीमित है। इसकी किसी भी अन्य व्याख्या का प्रभाव, एक महिला को बच्चे को जन्म देने और उस ‘पार्टनर’ के साथ बच्चे को पालने के लिए मजबूर करना होगा।