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Supreme Court: वंदे मातरम के अनिवार्य गायन मामले में याचिका खारिज, गृह मंत्रालय के सर्कुलर को दी गई थी चुनौती

Wed, 25 Mar 2026 12:43 PM IST
Jyoti Bhaskar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम गायन को अनिवार्य बनाए जाने को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। याचिका गृह मंत्रालय के एक सर्कुलर के खिलाफ दायर की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय गीत गाने का निर्देश अनिवार्य नहीं है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने यह फैसला सुनाया। पीठ ने कहा कि मुहम्मद सईद नूरी की तरफ से दायर याचिका सुनवाई के योग्य नहीं है। भेदभाव की आशंकाओं को अदालत ने अस्पष्ट करार दिया। याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि देश में हर धर्म का सम्मान किया जाता है।
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क्या सर्कुलर में वंदे मातरम न गाने पर दंड के प्रावधान?
हेगड़े ने अपनी दलीलों में कहा कि लोगों को अपनी आस्था के बावजूद राष्ट्रीय गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस सर्कुलर के कारण निष्ठा के सामाजिक प्रदर्शन में भाग लेना मजबूरी बन सकता है। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि क्या सर्कुलर में न गाने पर दंड के कोई प्रावधान किए गए हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या किसी व्यक्ति को न गाने के लिए हटाया गया था। इस पर हेगड़े ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वंदे मातरम गायन के दौरान व्यवधान पैदा करने पर दंड का प्रावधान किया गया है।

सर्कुलर की व्याख्या
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि केंद्र सरकार के निर्देश के खंड 5 में 'सकना' (may) शब्द का प्रयोग है। इसका अर्थ है कि राष्ट्रीय गीत गाने या न गाने की पूरी स्वतंत्रता है। यह प्रावधान किसी के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता है। मुख्य न्यायाधीश कांत ने भी हेगड़े से पूछा कि क्या याचिकाकर्ता को कोई नोटिस भेजा गया था।
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याचिका का आधार
पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि यदि उसे कोई दंडात्मक कार्रवाई या नोटिस मिलता है। तो वह फिर से अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। कोर्ट ने वर्तमान याचिका को भेदभाव की अस्पष्ट आशंका मात्र बताया। इसमें कोई ठोस आधार नहीं था।

तरुण के परिवार की सुरक्षा के लिए पुलिस के पास जाएं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दौरान हुई हिंसा में मारे गए 27 वर्षीय तरुण के परिवार की सुरक्षा से जुड़े मसले को पुलिस आयुक्त के समक्ष रखने के लिए कहा है।भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह मामला मुख्य रूप से सुरक्षा और प्रशासन से जुड़ा है, जिसे दिल्ली पुलिस देख सकती है।

याचिकाकर्ता पुलिस आयुक्त को विस्तृत आवेदन दें। पुलिस परिवार की सुरक्षा को लेकर खतरे का आकलन करेगी और जरूरी कदम उठाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर शिकायतों का समाधान नहीं होता है, तो याचिकाकर्ता हाईकोर्ट जा सकते हैं।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से मामले की जांच की मांग की गई। लेकिन कोर्ट ने इस मामले में इस पर विचार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हर मामले में सीबीआई जांच जरूरी नहीं होती और पुलिस पहले से जांच कर रही है।

कॉर्डेलिया क्रूज ड्रग मामला : समीर वानखेड़े को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत 
 सुप्रीम कोर्ट ने 2021 के कॉर्डेलिया क्रूज ड्रग मामले से जुड़े अनुशासनात्मक कार्रवाई के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करते हुए आईआरएस अधिकारी समीर वानखेड़े को अंतरिम राहत दी है। अदालत ने उन्हें एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने की अनुमति दी है।
जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ वानखेड़े की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के फैसले को पलट दिया था। कैट ने 19 जनवरी को वानखेड़े के खिलाफ जारी चार्जशीट से जुड़े सभी अनुशासनात्मक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। केंद्र सरकार ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जहां 27 फरवरी को कैट का आदेश रद्द कर दिया गया। इसके बाद वानखेड़े सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। चार्जशीट में आरोप है कि वानखेड़े ने एनसीबी में अपने कार्यकाल के बाद भी वहां के विधिक सलाहकार जापान बाबू से गोपनीय जानकारी मांगी और जांच को प्रभावित करने की कोशिश की।
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यौन उत्पीड़न मामले में निष्कासित कांग्रेस विधायक राहुल ममकुटाथिल की अग्रिम जमानत बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामले में कांग्रेस से निष्कासित विधायक राहुल ममकुट्टाथिल को दी गई अग्रिम जमानत को बरकरार रखा है। उन पर दुष्कर्म और जबरन गर्भपात कराने का आरोप है।जस्टिस एमएम सुंदरेश व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने पीड़िता की याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में राहुल को जमानत देने वाले केरल हाईकोर्ट के 12 फरवरी के आदेश को चुनौती दी गई थी। पीठ ने कहा, हालांकि हम हाईकोर्ट के अंतिम निर्णय में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं, लेकिन याचिकाकर्ता के संबंध में की गई टिप्पणियां आवश्यक नहीं हैं। इसलिए, उन्हें हटाया जाता है। पीड़िता के वकील ने कहा कि सहमति से बने रिश्ते के संबंध में हाईकोर्ट की टिप्पणियां मुकदमे को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
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