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SC: सिसोदिया की जमानत याचिकाओं पर सीबीआई-ईडी को नोटिस; बिहार सरकार ने आनंद मोहन की रिहाई को उचित ठहराया

Fri, 14 Jul 2023 12:58 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने छह जुलाई को जमानत याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और बेला एम त्रिवेदी की बेंच ने मनीष की जमानत अर्जी पर सुनवाई की।
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Supreme Court - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट में आज शराब नीति केस में जेल में बंद दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने दोनों जांच एजेंसियों को 28 जुलाई तक जवाब दाखिल करने को कहा है। मनीष ने 6 जुलाई को जमानत याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और बेला एम त्रिवेदी की बेंच ने मनीष की जमानत अर्जी पर सुनवाई की।

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सुनवाई के दौरान जस्टिस खन्ना ने कहा कि उन्हें सिसोदिया की पत्नी की बीमारी की स्थिति के बारे में पता है। उन्होंने यह भी कहा कि हम बीमार पत्नी के कारण याचिका पर विचार कर रहे हैं, न कि उनके स्टेटस को देखते हुए। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने सीबीआई और ईडी का पक्ष रखते हुए कहा कि पत्नी की बीमारी का हवाला देते हुए सिसोदिया की अंतरिम जमानत याचिका ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दी थी। हालांकि, पीठ ने राजू को जांच एजेंसियों की ओर से जवाब दाखिल करने को कहा।

बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आनंद मोहन की रिहाई को उचित ठहराया
बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष गोपालगंज के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट जी कृष्णैया की हत्या के मामले में गैंगस्टर से नेता बने आनंद मोहन को समय पूर्व रिहाई के अपने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में उचित ठहराया है।   फैसले के खिलाफ दिवंगत आईएएस अधिकारी कृष्णैया की पत्नी उमा देवी की ओर से दायर एक रिट याचिका का जवाब देते हुए राज्य सरकार ने कहा है कि पीड़ित की स्थिति सजा में छूट से इन्कार करने का कारक नहीं हो सकती। राज्य का कहना है कि आम जनता या लोक सेवक की हत्या की सजा समान है। पूर्व सांसद आनंद मोहन के नेतृत्व वाली भीड़ ने आईएएस अधिकारी जी कृष्णैया की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। इस मामले में 1994 में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। उन्हें 27 अप्रैल को समय पूर्व रिहा कर दिया गया।
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2002 में अपनी नीति पर दोबारा किया गौर
राज्य सरकार ने कहा कि इस अदालत से पारित विभिन्न आदेशों के मद्देनजर राज्य ने 2002 की अपनी नीति पर दोबारा गौर किया। राज्य सरकार ने कहा है कि एक लोक सेवक की हत्या के दोषी की आजीवन कारावास की समयपूर्व रिहाई के संबंध में अन्य राज्य सरकारों की नीति पर भी विचार किया गया है। यह पाया गया कि दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना, पांडिचेरी आदि अन्य राज्यों में किसी लोक सेवक या आम जनता की हत्या में उम्रकैद की सजा पाए दोषी की समय पूर्व रिहाई को लेकर कोई अंतर नहीं है।

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