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शिवसेना और 'धनुष-बाण' पर सुप्रीम कोर्ट में महासंग्राम: क्या बदल जाएगा असली मालिक, क्यों मचा है घमासान?

Wed, 02 Sep 2026 03:41 PM IST
राकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के नाम और 'धनुष-बाण' निशान को लेकर कानूनी जंग जारी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ यह तय कर रही है कि क्या सिर्फ विधायकों के संख्या बल पर किसी दल पर कब्जा माना जा सकता है। ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को असांविधानिक बताते हुए प्रतीक चिन्ह फ्रीज करने और बगावत करने वालों को अयोग्य ठहराने की मांग की है।  
 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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शिवसेना नाम और उसके चुनाव चिह्न 'धनुष-बाण' को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब देश की सबसे बड़ी अदालत में एक बेहद निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। उद्धव ठाकरे (शिवसेना यूबीटी) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई तेज कर दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन जजों की पीठ इस बात की कानूनी जांच कर रही है कि क्या चुनाव आयोग का एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना मानना संविधान के मुताबिक सही था या नहीं।  
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क्या विधायकों की बगावत से बदल सकती है मूल पार्टी?
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने एक बड़े सांविधानिक सवाल पर ध्यान केंद्रित किया है। बेंच यह समझ रही है कि क्या विधायकों का बहुमत (विधायक दल की फूट) मूल राजनीतिक दल के ढांचे और उसके कैडर पर हावी हो सकता है। उद्धव गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने पार्टी के संविधान और 19 लाख प्राथमिक सदस्यों की अनदेखी कर सिर्फ विधायकी संख्या बल के आधार पर फैसला दे दिया, जो पूरी तरह से गलत है।  

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बागी विधायकों पर दल-बदल कानून और अयोग्यता की तलवार
उद्धव ठाकरे पक्ष का कहना है कि शिंदे गुट की बगावत संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत साफ तौर पर दल-बदल का मामला है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि विधायकों की अयोग्यता पर फैसला सुप्रीम कोर्ट खुद करे या चुनाव आयोग के विवादित आदेश को रद्द करे। वहीं, मामला लंबे समय तक खिंचने के चलते ठाकरे गुट ने अंतरिम राहत के रूप में 'धनुष-बाण' निशान को फ्रीज करने की भी गुजारिश की है, ताकि राजनीतिक फायदा न उठाया जा सके।  
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क्या है अदालती दायरा?
दूसरी तरफ, शिंदे गुट और चुनाव आयोग का तर्क है कि चुने हुए प्रतिनिधियों का बहुमत ही असल में पार्टी के जनादेश का प्रतिनिधित्व करता है। सुप्रीम कोर्ट इस बात की बारीकी से जांच कर रहा है कि न्यायिक समीक्षा की सीमा कहां तक है और क्या चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र के शुरुआती फैसलों को सीधे खारिज किया जा सकता है।  
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