पिछले हफ्ते कोर्ट ने कहा था कि इस बात पर जोर देना कि गर्भकालीन सरोगेसी के लिए इच्छुक जोड़े के केवल अंडे और शुक्राणु का उपयोग किया जा सकता है, प्राथमिक तौर पर सरोगेसी (विनियमन) नियम, 2022 के नियम 14 (ए) के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में मेयर-रोकिटांस्की-कुस्टर-हॉसर (एमआरकेएच) सिंड्रोम से पीड़ित महिला को डोनर अंडे के जरिये सरोगेसी की अनुमति दे दी। एमआरकेएच सिंड्रोम ऐसी स्थिति है, जो उसे अंडे पैदा करने से रोकती है।
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शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता के संबंध में सरोगेसी नियमों में इस साल मार्च में किए गए संशोधन पर रोक लगाकर ऐसा किया है जो जोड़े की गर्भकालीन सरोगेसी के लिए दाता अंडे यानी डोनर एग के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है।
पिछले हफ्ते कोर्ट ने कहा था कि इस बात पर जोर देना कि गर्भकालीन सरोगेसी के लिए इच्छुक जोड़े के केवल अंडे और शुक्राणु का उपयोग किया जा सकता है, प्राथमिक तौर पर सरोगेसी (विनियमन) नियम, 2022 के नियम 14 (ए) के खिलाफ है।
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जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ एमआरकेएच नामक जन्मजात विकार से पीड़ित विवाहित महिलाओं की ओर से दायर याचिकाओं पर विचार कर रही है, जो गर्भकालीन सरोगेसी के माध्यम से जैविक मातृत्व प्राप्त करना चाहती हैं।
सरोगेसी नियम को दी थी चुनौती
याचिकाकर्ताओं ने सरोगेसी नियमों के नियम 7 के तहत फॉर्म 2 में इस साल 14 मार्च को किए गए संशोधन को चुनौती दी है, जो सरोगेट मां की सहमति और सरोगेसी के लिए समझौते का फॉर्म है।
संशोधन में यह सुनिश्चित करने के लिए फॉर्म 2 में पैराग्राफ 1 (डी) को जोड़ा गया कि सरोगेसी से गुजरने वाले जोड़े के पास दाता युग्मक नहीं हो सकते और नर और मादा दोनों युग्मक इच्छुक जोड़े से आने चाहिए।