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कदाचार के आरोप में सेना से बर्खास्त सिपाही को सर्वोच्च न्यायालय ने दी राहत

Thu, 27 Dec 2018 04:18 AM IST
गौरव द्विवेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कदाचार के कारण नौकरी से बर्खास्त सेना के एक जवान का बचाव करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट मार्शल की कार्यवाही में कानूनी मदद केवकील की सेवा लेने की इजाजत न देना नैसर्गिक न्याय केसिद्धांत के विपरीत है।  

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न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि किसी को भी कानूनी मदद के लिए सलाहकार की सेवा लेने से नहीं रोका जा सकता और वह भी तब, जब वह खर्च वहन करने को तैयार हो। कमांडिग ऑफिसर ने सिपाही जसवंत सिंह को कोर्ट मार्शल की कार्यवाही के दौरान वकील रखने की इजाजत देने से इनकार कर दिया था। कमांडिंग ऑफिसर ने नियम का हवाला देते हुए कहा था कि कोर्ट मार्शल की कार्यवाही के दौरान तब ही वकील या कानूनी सहयोगी रखने की इजाजत दी जाती है जब अपराध केलिए फांसी की सजा संभव हो।  

पीठ ने कहा कि इस मामले में सिपाही को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया और उसे छह महीने कैद की सजा भी गई। सिपाही की आजीविका और स्वतंत्रता, दोनों छीन ली गई। ऐसे में उसे मदद के लिए वकील या कानूनी सहयोगी न रखने की इजाजत न देना नैसर्गिंक न्याय के सिद्धांत का घोर उल्लंघन है। यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (एएफटी) के आदेश को दरकिनार कर दिया। हालांकि पीठ ने साफ किया कि उसने सिर्फ नैसर्गिंक न्याय के सिद्धांत के आधार पर ही आदेश में दखल दिया है। केंद्र सरकार कानून के हिसाब से कोई भी कदम उठाने के लिए स्वतंत्र है।
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जसवंत सिंह एक जनवरी, 2003 में सेना में बतौर सिपाही भर्ती हुर्आ था। वर्ष 2010 में उस पर वरिष्ठ अधिकारी से मारपीट करने और एक सूबेदार के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने के आरोपों के कोर्ट मार्शल की कार्रवाई चली। कोर्ट मार्शल में उसे दूसरे आरोप से बरी कर दिया गया लेकिन पहले मामले में दोषी मानते हुए उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया और साथ ही छह महीने कैद की सजा सुनाई गई। जसवंत सिंह ने इस फैसले को ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी लेकिन उसकी अपील खारिज हो गई। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 

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