पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ समय पहले जारी आदेश का जिक्र करते हुए कहा, जमानत देते समय अदालत के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह विस्तृत कारण बताए, खासकर तब जब मामला आरोप के प्रारंभिक चरण में हो और जिस पर आरोप नहीं लगाया गया हो
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार के कहा, अदालतें जमानत अर्जी पर फैसला लेते वक्त मामले के किसी भी पहलू को अनदेखा नहीं कर सकतीं। जैसे अभियुक्त पर लगाए गए आरोप और दोषी ठहराये जाने की स्थिति में सजा की गंभीरता आदि। इस टिप्पणी के साथ ही शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के 2019 में दिए दो फैसलों को दरकिनार कर दिया। हाईकोर्ट ने दो आरोपियों को हत्या के मामले में जमानत दी थी।
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जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उसने अपने पति के हत्यारों को दी गई जमानत को चुनौती दी थी। पीठ ने कहा, हाईकोर्ट ने जमानत देते वक्त एक भी पहलू पर गौर नहीं किया।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ समय पहले जारी आदेश का जिक्र करते हुए कहा, जमानत देते समय अदालत के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह विस्तृत कारण बताए, खासकर तब जब मामला आरोप के प्रारंभिक चरण में हो और जिस पर आरोप नहीं लगाया गया हो या फिर आरोपपत्र दाखिल नहीं किया गया हो। लेकिन जमानत पर फैसला करते हुए महत्वपूर्ण पहलुओं जैसे लगाए गए आरोप, दोषी ठहराये जाने की स्थिति में सजा की गंभीरता आदि को अनदेखा नहीं करना चाहिए।
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उक्त मामले में हाईकोर्ट ने ऐसी ही गलती की है। इसलिए फैसले को खारिज किया जाता है। पीठ ने कहा, सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई मौकों पर इन कारकों पर चर्चा कर चुका है जिनका जमानत पर फैसला लेते वक्त विशेष ध्यान रखने की जरूरत है।