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Supreme Court: स्थाई कमीशन पर महिला अफसरों को पुरुषों के बराबर आंकना गलत, कोर्ट ने मांगी नई नीति की रूपरेखा

Wed, 06 Aug 2025 09:37 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि महिला और पुरुष सेना अधिकारी एक जैसे नहीं हैं और उन्हें एक ही मापदंड से नहीं आंका जा सकता। यह टिप्पणी 75 महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आई। कोर्ट ने नई गाइडलाइन की जरूरत जताई और 2020 के फैसले को याद दिलाया, जिसमें महिलाओं को परमानेंट कमीशन का हकदार ठहराया गया था। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि भारतीय सेना की महिला और पुरुष अधिकारी दो अलग-अलग श्रेणियां हैं, जिन्हें स्थायी सेवा देने के लिए समान मापदंडों पर नहीं आंका जा सकता। कोर्ट में यह टिप्पणी उन 75 से अधिक महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आई, जिन्होंने यह दावा किया है कि उन्हें लिंग भेदभाव के चलते परमानेंट कमीशन नहीं दिया गया।
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महिला अधिकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं हुजेफा अहमदी, मेनका गुरुस्वामी और वी. मोहना ने कोर्ट में दलीलें रखीं। अहमदी ने कहा कि सितंबर 2010 में कमीशन पाने वाली महिला अधिकारियों को 15 जनवरी 1991 की नीति के अनुसार परमानेंट कमीशन मिलना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2020 में सेलेक्शन बोर्ड नंबर 5 ने महिला और पुरुष अधिकारियों को एक ही कट-ऑफ और समान चयन मापदंडों पर आंका, जो समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।

कोर्ट ने पूछा- मूल्यांकन के लिए क्या होनी चाहिए कसौटी?
न्यायमूर्ति सूर्यकांत, उज्जल भुइयां और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि वह इस मामले में सभी पक्षों की बात सुनने के बाद एक समान गाइडलाइन का प्रस्ताव रख सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि मूल्यांकन के दौरान विशेष प्रशिक्षण जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने अधिकारियों से यह भी पूछा कि उनके अनुसार परमानेंट कमीशन के लिए मूल्यांकन की उचित कसौटी क्या होनी चाहिए।
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2020 का फैसला बना महिला अधिकारियों की उम्मीद
महिला याचिकाकर्ताओं ने 17 फरवरी 2020 को आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का भी हवाला दिया। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि केवल स्टाफ पोस्टिंग तक महिलाओं को सीमित रखना और उन्हें कमांड नियुक्तियों से बाहर रखना कानूनन सही नहीं है। कोर्ट ने कहा था कि परमानेंट कमीशन करियर ग्रोथ का माध्यम है, न कि औपचारिक अधिकार देने की रस्म।

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महिलाओं की उपेक्षा से मनोबल गिरता है- कोर्ट
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी दोहराया कि केंद्र सरकार को महिला अधिकारियों का मनोबल गिराने से बचना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि एसएससी महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन न देकर बाहर करने की जल्दबाजी ना हो। इससे पहले 9 मई को कोर्ट ने केंद्र से कहा था कि इस माहौल में महिला अधिकारियों का मनोबल तोड़ना ठीक नहीं होगा।
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अगली सुनवाई सात अगस्त को, अंतरिम राहत जारी रहेगी
सुनवाई पूरी नहीं हो सकी और अब यह सात अगस्त को जारी रहेगी। तब तक के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले से जारी अंतरिम आदेशों को बरकरार रखा है, जिसके तहत केंद्र सरकार को आदेश दिया गया है कि इन महिला अधिकारियों को सेवा से बाहर न किया जाए। अब यह देखना होगा कि क्या कोर्ट एक निष्पक्ष और व्यावहारिक मानदंड तय कर पाता है जिससे महिला अधिकारियों को भी बराबरी का अवसर मिल सके।



 
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