सुप्रीम कोर्ट बैंक के साथ व्यापारिक लेनदेन से संबंधित अप्रमाणित रसीदों जैसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सबूत के रूप में स्वीकार करने के मामले पर सुनवाई करेगा।
न्यायिक प्रक्रिया के दौरान इलेक्टॉनिक सबूतों की बढ़ती संख्या को देखते हुए शीर्ष न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि इस बात की जांच करने की जरूरत है कि क्या डिजिटल दस्तावेजों को मुख्य या दूसरे दर्जे के साक्ष्य के रूप में माना जा सकता है जो सिर्फ प्रमाणित करने के बाद ही स्वीकार्य होते हैं।
जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की पीठ ने कहा कि क्या अदालत इलेक्टॉनिक साक्ष्यों को सिर्फ यह कहकर अलग हटा सकती है कि प्रमाणित होने के कारण इन्हें स्वीकार नहीं किया जाएगा भले ही वह विश्वसनीय हों।
अदालत ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को नोटिस जारी किया और इस मामले में सहयोग मांगा। इस मामले में न्यायमित्र नियुक्त की गई सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि इस मामले पर जवाब देने के लिए उन्हें समय चाहिए।
पीठ ने कहा, ‘इस संबंध में कई निर्णय होने का कारण हम इस मामले को बड़ी पीठ को भी भेज सकते हैं। शीर्ष अदालत के फैसले के बावजूद विभिन्न हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के दौरान भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत साक्ष्य के प्रमाणित होने की मांग की जाती है।’
पीठ ने कहा, ‘इस मामले को बड़ी पीठ को सौंपना इस मामले को ठंडे बस्ते में डालने के समान होगा क्योंकि इस मामले की सुनवाई होने में 10 साल भी लग सकते हैं। इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए इंतजार नहीं किया जा सकता। इसलिए इस मुद्दे पर सुनवाई की जरूरत है।’