शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ के 2012 के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के पूर्व सहायक अभियंता (सिविल) प्रदीप कुमार बनर्जी की बर्खास्तगी को खारिज कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक नियोक्ताओं को अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान कदाचार सिद्ध करने और दोषी कर्मचारी को बर्खास्त करने के लिए सिर्फ संभावनाओं की अधिकता साबित करनी होगी। यह आपराधिक मुकदमों में आवश्यक ‘उचित संदेह से परे’ साबित करने की तुलना में कम कठोर मानक है।
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शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ के 2012 के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के पूर्व सहायक अभियंता (सिविल) प्रदीप कुमार बनर्जी की बर्खास्तगी को खारिज कर दिया गया था। जस्टिस जेके माहेश्वरी व जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संबंधित आपराधिक मामले में बरी होने के बावजूद एएआई के एक पूर्व इंजीनियर की बर्खास्तगी को बरकरार रखा। पीठ ने एएआई के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि बनर्जी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई उचित थी। यह महत्वपूर्ण फैसला सार्वजनिक नियोक्ताओं के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है, जो अनुशासनात्मक कार्यवाही के तहत कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त कर सकते हैं, भले ही कर्मचारी परिणामी आपराधिक मामलों में बरी हो गए हों।
कानून के स्थापित सिद्धांत की जांच में हाईकोर्ट ने की गलती
जस्टिस मेहता ने 28 पन्ने के आदेश में कहा कि यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष पर मामले को उचित संदेह से परे साबित करना अधिक मुश्किल है। हालांकि, अनुशासनात्मक जांच में, विभाग पर भार सीमित है और उसे संभावनाओं की प्रबलता के सिद्धांत पर अपना मामला साबित करना जरूरी है। मौजूदा मामले में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने आपराधिक मुकदमे में आवश्यक सबूत के मानक को नियोक्ता की अनुशासनात्मक जांच की जगह रखने में गंभीर गलती की है।