मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। इस दौरान चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाताओं की नागरिकता की जांच केवल चुनावी उद्देश्य से की जा रही है, न कि किसी को डिपोर्ट करने के लिए। आयोग ने इसे ‘लिबरल, सॉफ्ट-टच’ प्रक्रिया बताया, जिसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं है।
देश के अलग-अलग राज्यों में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहण पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। इसी बीच अब इस मामले में चुनाव आयोग (ईसीआई) ने सर्वोच्च न्यायालय में अपनी दलील दी है। आयोग ने साफ किया है कि मतदाताओं की नागरिकता की जांच सिर्फ चुनावी उद्देश्य से की जा रही है, न कि किसी गैर-नागरिक को देश से बाहर निकालने (डिपोर्ट) के लिए। यह मामला मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्या कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष चल रहा है।
‘लाल बाबू हुसैन’ फैसले पर क्या कहा आयोग ने?
बता दें कि याचिकाकर्ताओं ने 1995 के लाल बाबू हुसैन केस का हवाला दिया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में है तो उसे नागरिक माना जाएगा और नागरिकता पर सवाल उठाने वाले पर सबूत देने की जिम्मेदारी होगी। इस पर द्विवेदी ने कहा कि लाल बाबू केस की परिस्थितियां अलग थीं। उस मामले में पहले ही एसआईआर हो चुका था।
उन्होंने बताया कि जांच पुलिस द्वारा की गई थी। पुलिस की कोई रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं थी। द्विवेदी ने आगे कहा कि इसके ठीक उलट मौजूदा मामले में एसआईआर खुद चुनाव आयोग कर रहा है। इस दौरान पुराने मतदाता सूची (खासकर 2002 की सूची) को पर्याप्त प्रमाणिक महत्व दिया जा रहा है।
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इसके साथ ही एसआईआर नोटिफिकेशन के निर्देश संख्या 3 का हवाला देते हुए द्विवेदी ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति का नाम पिछली मतदाता सूची में है, तो उसे नागरिक मानने की दिशा में पर्याप्त महत्व दिया जाएगा। नोटिस जारी करने से पहले इस तथ्य को ध्यान में रखा जाएगा। चुनाव आयोग ने यह भी बताया कि जून 2025 तक के सभी मतदाताओं को एन्यूमरेशन फॉर्म भेजे गए।