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Supreme Court: पंजाब सिविल सेवा नियमों को अपडेट नहीं करने पर कोर्ट की फटकार; कहा- इनमें हैं कई विसंगतियां

Wed, 14 Jun 2023 07:42 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अदालत ने कहा कि वास्तव में आज पुलिस महानिरीक्षक प्रशासनिक रूप से पुलिस महानिदेशक और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के अधीन है। ये नियम भी उस समय बनाए गए थे जब रेंज और कमिश्नरेट की व्यवस्था नहीं बनी थी।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सिविल सेवा नियम, 1934 को अपडेट या संशोधित नहीं करने पर नाराजगी जाहिर की है। अदालत ने इस दौरान कहा कि ये नियम तब के हैं जब इंस्पेक्टर जनरल राज्य पुलिस का प्रमुख होता था। समय के साथ इनमें भी बदलाव किए जाने थे। बदलाव न होने से बदलते समय और परिस्थितियों के अनुरूप इसमें विसंगतियां पैदा हो गई हैं। 

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जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की अवकाशकालीन पीठ ने इस मसले पर सुनवाई की। उन्होंने कहा कि मूल रूप से 1934 में बनाए गए नियमों में अधिकारियों को महानिरीक्षक, एक उप महानिरीक्षक और एक पुलिस अधीक्षक के रूप में माना गया था। उस समय का इंस्पेक्टर जनरल यानी महानिरीक्षक (जब सेवा को शाही/भारतीय पुलिस कहा जाता था) राज्य पुलिस का प्रमुख होता था, लेकिन आज ज्यादातर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पुलिस महानिदेशक सर्वोच्च पद है। इस पर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी की तैनाती होती है।

अदालत ने कहा कि वास्तव में आज पुलिस महानिरीक्षक प्रशासनिक रूप से पुलिस महानिदेशक और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के अधीन है। ये नियम भी उस समय बनाए गए थे जब रेंज और कमिश्नरेट की व्यवस्था नहीं बनी थी। निश्चित रूप से, बेहतर या बदतर के लिए नियम समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए हैं। हम यह समझ नहीं पा रहे हैं कि संबंधित अधिकारी भ्रम को दूर करने के लिए कम से कम पदों के सही आधिकारिक विवरण के साथ नियमों को अपडेट/संशोधित करने में असमर्थ क्यों हैं।
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हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील खारिज
शीर्ष अदालत ने यह बात पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ एक व्यक्ति की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए कही। हाईकोर्ट ने हरियाणा के पुलिस महानिदेशक के आदेश को बहाल कर दिया था, जिसमें भ्रष्टाचार, अवज्ञा और कर्तव्य में लापरवाही के कारण याचिकाकर्ता के खिलाफ वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया गया था। पीठ ने कहा कि डीजीपी ने अपीलकर्ता को उचित कारण बताओ नोटिस दिया और उसके बाद आगे की कार्रवाई की। अदालत ने कहा कि डीजीपी को कार्रवाई को मनमाना नहीं कहा जा सकता और उस पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया।

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