सुनवाई के दौरान एनएलसीजेआरटी के अध्यक्ष वकील मैथ्यूज जे नेदमपारा ने कहा, हम चाहते हैं कि साल 1993 से पहले की व्यवस्था दोबारा लागू हो। जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति और तबादले का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास होता था। इसमें कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत राष्ट्रपति के पास सीजेआई से परामर्श के बाद उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति का अधिकार है।
‘सेकंड जजेस केस’ नाम से चर्चित
नौ जजों की बेंच वाले साल 1993 के फैसले को ‘सेकंड जजेस केस’ भी कहा जाता है। इस फैसले में ये धारणा दी गई कि ‘परामर्श’ का अर्थ भारत के मुख्य न्यायाधीश की अनिवार्य ‘सहमति’ माना जाए। इस फैसले से पहले कार्यकारी प्रमुख को न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले में प्रधानता प्राप्त थी।
इसके बाद साल 1998 में नौ जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने साल 1993 के फैसले को बरकरार रखते हुए न्यायाधीशों की नियुक्ति का कॉलेजियम सिस्टम पेश किया, जिसमें सीजेआई के नेतृत्व को प्रधानता दी गई।
इसके बाद 16 अक्तूबर, 2015 को जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को खत्म किया और संविधान संशोधन के तहत मौजूदा कॉलेजियम सिस्टम कायम किया।