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'नहीं दे सकते निर्देश': शेयर बाजार में पारदर्शिता पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, महुआ मोइत्रा की याचिका खारिज

Thu, 29 Oct 2026 01:34 PM IST
देवेश त्रिपाठी पीटीआई, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा की उस याचिका का निपटारा कर दिया, जिसमें निवेश फंडों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के वास्तविक लाभार्थी मालिकों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि मौजूदा कानूनी या नियामकीय व्यवस्था के बिना सेबी को ऐसा करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा की भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) से जुड़ी एक याचिका का निपटारा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को वैकल्पिक निवेश फंड (एआईएफ), विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) और उनके मध्यस्थों के वास्तविक लाभार्थी मालिकों तथा निवेश पोर्टफोलियो की पूरी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया।
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अदालत ने कहा कि ऐसा आदेश देने के लिए मौजूदा कानूनी या नियामकीय व्यवस्था का होना जरूरी है। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति डीके उपाध्याय की पीठ ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की ओर से दायर याचिका का निपटारा कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की याचिका पर उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने शुरुआत में मोइत्रा के याचिका दायर करने पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि वह यह मुद्दा संसद में उठा सकती थीं और इस पर चर्चा की मांग कर सकती थीं। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी मौजूदा कानूनी व्यवस्था के बिना परमादेश जारी नहीं किया जा सकता। इसके बाद पीठ ने याचिका का निपटारा कर दिया।
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पीठ ने कहा, "अगर कोई कानूनी व्यवस्था होती और सेबी उसका पालन नहीं कर रहा होता, तो अदालत अनुपालन का निर्देश दे सकती थी। लेकिन किसी ढांचे या कानूनी व्यवस्था के अभाव में अदालत परमादेश जारी नहीं कर सकती।"

महुआ मोइत्रा  के वकील प्रशांत भूषण ने अदालत में दी क्या दलील?
महुआ मोइत्रा की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि कानूनी व्यवस्था नहीं होने के बावजूद अदालत सेबी को इन फंडों के वास्तविक लाभार्थियों की पूरी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दे सकती है। उन्होंने कहा कि इन निवेशकों की ओर से कंपनियों के शेयरों की कीमत बढ़ाए जाने के कारण आम निवेशकों के साथ हेरफेर हो रहा है।

मोइत्रा ने अपनी जनहित याचिका में भारत के वित्तीय बाजारों में पारदर्शिता बढ़ाने और निवेशकों को जागरूक करने की मांग की थी। इसके लिए उन्होंने वैकल्पिक निवेश फंडों (एआईएफ) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) से जुड़े वास्तविक लाभार्थी मालिकों और उनके निवेश की जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य करने की मांग की थी। याचिका में कहा गया कि सेबी भारत के प्रतिभूति बाजारों का नियमन करता है। अपने दायित्व के तहत वह एआईएफ और एफपीआई की गतिविधियों की निगरानी भी करता है।

प्रशांत भूषण ने अदाणी-हिंडनबर्ग मामले का दिया हवाला
उन्होंने कहा कि वास्तविक लाभार्थी मालिकों की जानकारी देने की व्यवस्था पहले मौजूद थी, लेकिन 2018 में इसे हटा दिया गया। इसके बाद संबंधित संस्थाओं के लिए धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) का पालन करना जरूरी रह गया। भूषण ने अदाणी-हिंडनबर्ग मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित विशेषज्ञ समिति की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि जानकारी सार्वजनिक करने की अनिवार्यता हटने से नियामकीय व्यवस्था कमजोर हुई है।

शेयरों की कीमतों में कृत्रिम तेजी का उदाहरण देते हुए भूषण ने कहा कि अगर किसी कंपनी के शेयर तेजी से बढ़ रहे हों, तो शेयर ब्रोकर छोटे निवेशकों को उसमें पैसा लगाने की सलाह दे सकता है। लेकिन निवेशक को यह पता नहीं होता कि शेयर की कीमत बढ़ने के पीछे उसी कंपनी के प्रवर्तकों का एआईएफ या एफपीआई के जरिये शेयर खरीदना हो सकता है। अगर यह जानकारी सामने हो, तो निवेशक शायद उस शेयर में पैसा न लगाए।

केंद्र की ओर से मिला क्या जवाब?
भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि याचिका में मांगी गई राहत का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। उन्होंने सवाल किया, "क्या आप इसे बर्बाद करना चाहते हैं?" भूषण ने जवाब दिया कि इस व्यवस्था का असर वैसा ही होगा, जैसा 2018 से पहले था, जब वास्तविक लाभार्थी मालिकों की जानकारी देना जरूरी था। उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ समिति ने भी इसकी सिफारिश की थी।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, "अगर कोई नीति है कि जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए और आप उसे लागू करने का निर्देश मांग रहे हैं, तो बात अलग है। लेकिन अगर ऐसी कोई नीति ही मौजूद नहीं है, तो क्या हम ऐसा आदेश जारी कर सकते हैं?" भूषण ने जोर दिया कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए ऐसी नीति जरूरी है। लोगों को पता होना चाहिए कि शेयर कौन खरीद रहा है और कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाने या गिराने में किसकी भूमिका है।
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