तीन साल की बच्ची से दुष्कर्म के बाद हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने छत्तीसगढ़ के रहने वाले आरोपी लोचन श्रीवास की याचिका पर यह आदेश दिया। ट्रायल कोर्ट ने उसे मौत की सजा सुनाई थी। इसके बाद छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने उसे बरकरार रखा था।
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल जज ने 17 जून 2016 को आरोपी को दोषी ठहराया था। उसी दिन उसे मौत की सजा सुनाई गई थी। पीठ ने कहा कि दोषी कोई कुख्यात अपराधी नहीं था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि अपीलकर्ता के सुधार और पुनर्वास की कोई संभावना नहीं है। ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने सिर्फ अपराध पर विचार किया। अपराधी, उसकी मानसिक स्थिति, उसकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि इत्यादि पर विचार नहीं किया।
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता युवा है, जो अपराध के वक्त 23 साल का था। वह ग्रामीण पृष्ठभूमि का है। सरकार ने ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जिससे यह प्रदर्शित होता हो कि आरोपित के सुधरने या उसके पुनर्वास की कोई संभावना नहीं है। शीर्ष अदालत ने लोचन के छोटे भाई और बड़ी बहन की ओर से दाखिल हलफनामों पर भी संज्ञान लिया जिसमें दावा किया गया है कि स्कूल में उसका प्रदर्शन अच्छा था और परिवार को गरीबी से निकालने के लिए उसने लगातार प्रयास किए।
पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता का जेल में व्यवहार भी ठीक रहा है। उसकी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि भी नहीं है। यह उसका पहला अपराध है। इसमें कोई शक नहीं है कि यह अपराध जघन्य है। शीर्ष अदालत ने आदेश में यह भी कहा कि हमने पाया कि त्वरित सुनवाई वांछनीय है, लेकिन नियुक्ति के बाद आरोपित के वकील को अपना केस तैयार करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए था।
अभियोजन के अनुसार, पीडि़त बच्ची का परिवार और लोचन एक ही बिल्डिंग में रहते थे। 24 फरवरी 2016 को बच्ची लापता हो गई थी और लोचन ने उसे तलाशने का प्रस्ताव किया था। बाद में उसने बताया कि बच्ची सड़क किनारे एक पोल के पास झाड़ियों में एक बोरी में बंधी हुई पड़ी थी। इस पर लोगों को उस पर संदेह हुआ और पुलिस को सूचित कर दिया। पुलिस ने उससे पूछताछ की और जिसमें उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।