सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि दयावश नियुक्ति कोई अधिकार नहीं, बल्कि केवल मानवीय आधार पर दिया गया अपवाद है। मृत कर्मचारी के आश्रित, भले ही योग्य हों, किसी भी ऊंचे पद पर नियुक्ति को अधिकार के रूप में मांग नहीं कर सकते। जस्टिस राजेश बिंदल और मनमोहन की बेंच ने यह फैसला तमिलनाडु सरकार की ओर से दायर दो याचिकाओं पर सुनाया, जिनमें मद्रास हाई कोर्ट ने सफाई कर्मचारियों को दयावश नियुक्ति के बाद जूनियर असिस्टेंट पद पर प्रोमोशन देने का आदेश दिया था।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
कोर्ट ने कहा दयावश नियुक्ति अपवाद है, अधिकार नहीं। यह नियुक्ति मानवीय आधार पर दी जाती है, ताकि अचानक हुए दुखद निधन के बाद परिवार आर्थिक संकट से उबर सके। केवल योग्य होना उच्च पद की मांग का आधार नहीं हो सकता। एक बार आश्रित को नौकरी मिल जाए तो दयावश नियुक्ति का उद्देश्य पूरा हो जाता है। इसके बाद उच्च पद पर नियुक्ति मांगना अनंत दया जैसा होगा, जो कानून के खिलाफ है।
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क्यों रद्द किया हाई कोर्ट का आदेश?
कोर्ट ने कहा कि जिन आश्रितों को स्वीपर के तौर पर नियुक्त किया गया, उन्होंने बिना आपत्ति पद जॉइन किया। इससे साबित होता है कि परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी हो गईं। इसलिए अब ऊंचे पद की दोबारा दयावश मांग करने का कोई आधार नहीं। बेंच ने हाई कोर्ट के आदेश को कानून की भावना के खिलाफ और त्रुटिपूर्ण बताया और रद्द कर दिया।
कोर्ट की साफ बात: बराबरी का अधिकार भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान केअनुच्छेद 14 और 16 के तहत सरकारी नौकरियों में सभी को समान अवसर मिलना चाहिए। दयावश नियुक्ति उसी नियम का अपवाद है, इसलिए इसे अधिकार बनाना संभव नहीं है। कोर्ट ने याद दिलाया कि इस तरह की नियुक्ति केवल उस संकट की घड़ी में दी जाती है जब परिवार कमाने वाले को खो देता है, ताकि परिवार गरीबी में न धकेला जाए। इसका मतलब यह नहीं कि आश्रित आगे चलकर उच्च पद भी मांग सके।