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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के दोषी की फांसी की सजा उम्रकैद में बदली, कही बड़ी बात

Sun, 30 Apr 2023 05:22 AM IST
Jeet Kumar अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट से अपीलकर्ता दिगंबर के दोषसिद्धि के निर्णय को तो बरकरार रखा, लेकिन इस मामले को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ की श्रेणी का मानने से इन्कार कर दिया।
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Supreme Court - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा कि एकमात्र चोट से हत्या करना ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ की श्रेणी में नहीं आता, भले ही दोहरा हत्याकांड क्यों न हो। यह कहते हुए शीर्ष अदालत ने बहन और उसके प्रेमी की हत्या के दोषी की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया है।

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जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट से अपीलकर्ता दिगंबर के दोषसिद्धि के निर्णय को तो बरकरार रखा, लेकिन इस मामले को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ की श्रेणी का मानने से इन्कार कर दिया। पीठ ने यह भी पाया कि अपीलकर्ता का कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा है और वर्ष 2017 में हुई इस घटना के समय वह 25 वर्ष का था।

 इतना ही नहीं, हत्या के बाद दोषी ने खुद थाने पहुंचकर आत्मसमर्पण किया और अपने खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई। पीठ ने यह भी कहा कि परिवीक्षा अधिकारी, नांदेड़ के साथ-साथ जेल अधीक्षक की रिपोर्ट में कहा गया है कि दोषी अच्छा व्यवहार करने वाला, मदद करने वाला और नेतृत्व के गुणों वाला व्यक्ति है। 
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क्रूर तरीके से हत्या को नहीं दिया अंजाम
पीठ ने फैसले में कहा है कि चिकित्सीय साक्ष्य से यह पता चलता है, अपीलकर्ताओं ने क्रूर तरीके से हत्या को अंजाम नहीं दिया था, क्योंकि दोनों मृतकों को केवल एक ही घातक चोट लगी है। ऐसे में हमारा मानना है कि इसे ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ मामला नहीं माना जा सकता है। वहीं, पीठ ने उम्रकैद की सजा पाए सह आरोपी की आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।

अनुच्छेद 142 की शक्तियों का इस्तेमाल कर शादी को खत्म करने पर सुप्रीम फैसला कल
सुप्रीम कोर्ट एक मई को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशाल शक्तियों का इस्तेमाल करने के लिए व्यापक मानदंडों पर अपना फैसला सुना सकता है, जिसमें सहमति देने वाले जोड़ों के विवाह को पारिवारिक अदालतों में भेजे बिना खत्म करने की बात है। जस्टिस एसके कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस एएस ओका, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेके माहेश्वरी की पांच सदस्यीय पीठ ने पिछले साल 29 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

अदालत ने अपना आदेश सुरक्षित रखते हुए कहा था कि सामाजिक बदलाव में थोड़ा समय लगता है और कभी-कभी कानून लाना आसान होता है, लेकिन समाज को इसके साथ बदलने के लिए राजी करना मुश्किल होता है। शीर्ष अदालत ने देश में विवाह में परिवार की बड़ी भूमिका को स्वीकार किया था। संविधान का अनुच्छेद 142 शीर्ष अदालत के आदेशों और उसके समक्ष किसी भी मामले में पूर्ण न्याय प्रदान करने के आदेशों को लागू करने से संबंधित है।

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