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Supreme Court: बंगाल के मामले पर सीजेआई सख्त, पूछा- मालदा के डीएम-एसपी क्यों नहीं गए, ये अदालत को चुनौती जैसा

Thu, 02 Apr 2026 11:05 AM IST
Jyoti Bhaskar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

Supreme Court: पश्चिम बंगाल के मालदा से जुड़े मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत ने सख्त टिप्पणी की है। चीफ जस्टिस ने सवाल किया कि मालदा के डीएम और पुलिस अधीक्षक (एसपी) मौके पर क्यों नहीं गए? उन्होंने मौखिक टिप्पणी में कहा कि ये अदालत को चुनौती देने जैसा है। जानिए क्या है पूरा मामला
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सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार के बर्ताव पर सख्ती दिखाई - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया में तैनात न्यायिक अधिकारियों के साथ हुई हिंसा और डराने-धमकाने की घटनाओं पर गंभीर रुख अपनाया है। इस मामले पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सख्त टिप्पणी की है।
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सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल के डीएम और पुलिस अधीक्षक (एसपी) के रवैये पर भी सख्त टिप्पणी की। सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा कि दोनों अधिकारी मौके पर क्यों नहीं पहुंचे। सात न्यायिक अधिकारियों को नौ घंटे तक बंधक बनाकर रखे जाने का ये मामला बेहद गंभीर है।

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बंगाल सरकार को भी लगाई फटकार
उन्होंने कहा कि ये मामला अदालत को चुनौती देने जैसा है। कोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार को भी फटकार लगाई। सीजेआई ने कहा कि मालदा में हुई हिंसा की घटना न्यायपालिका पर दबाव बनाने के साथ-साथ कानून-व्यवस्था को भी चुनौती देने की तरह है। कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने के मामले में सरकार के रवैये को लचर बताया और कहा कि इस मामले में तत्काल कोई कार्रवाई नहीं की गई।

सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस घटना को न्याय प्रशासन में बाधा डालने की सुनियोजित और दुस्साहसी कोशिश करार दिया। कोर्ट ने कहा कि सात न्यायिक अधिकारियों, जिनमें तीन महिला अधिकारी भी शामिल हैं, को घंटों तक बिना सुरक्षा, भोजन और पानी के छोड़ दिया गया, जबकि राज्य प्रशासन को पहले से सूचना दी गई थी।

बंगाल के वरिष्ठ अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी
अदालत ने इस मामले में राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों- मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने उनके रवैये को बेहद निंदनीय बताते हुए पूछा है कि समय रहते प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए। मामले की अगली सुनवाई में संबंधित अधिकारियों की वर्चुअल उपस्थिति अनिवार्य की गई है और उनसे अनुपालन रिपोर्ट भी मांगी गई है।

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इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती कराए। कोर्ट ने सभी स्थलों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लागू करने, आम लोगों की आवाजाही सीमित करने और अधिकारियों और उनके परिवारों को किसी भी खतरे का तत्काल आकलन करने का आदेश दिया है।

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बड़ा अधिकारी अधीनस्थ के समान सजा की मांग नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी उच्च पद पर कार्यरत अधिकारी समान अपराध के लिए निचले पद के कर्मचारियों के बराबर सजा की मांग नहीं कर सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि पद जितना ऊंचा होता है, जिम्मेदारी और जवाबदेही भी उतनी ही अधिक होती है। उसकी सजा का निर्धारण भी पद के हिसाब से बदल सकती है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए पंजाब एवं सिंध बैंक के वरिष्ठ प्रबंधक राज कुमार की सेवा से बर्खास्तगी को सही ठहराया है। मामले के मुताबिक, वरिष्ठ प्रबंधक ने अपने अधीनस्थ बैंक अधिकारी और एक गनमैन के साथ मिलकर ग्राहकों के पैसे का गबन किया और बैंक रिकॉर्ड में हेरफेर की। जांच में यह आरोप सही पाए गए। इसके बाद बैंक के अनुशासनात्मक अथॉरिटी ने वरिष्ठ प्रबंधक को सेवा से बर्खास्त कर दिया, जबकि सह आरोपियों को वेतन में कमी या अनिवार्य सेवानिवृत्ति जैसी अपेक्षाकृत हल्की सजा दी गई। इसके बाद प्रबंधक ने हाईकोर्ट की शरण ली थी। हाईकोर्ट ने माना था भेदभाव : हाईकोर्ट ने इस अंतर को अनुच्छेद 14 के तहत भेदभाव मानते हुए वरिष्ठ प्रबंधक की सजा को बर्खास्तगी से बदलकर अनिवार्य सेवानिवृत्ति कर दिया था।

समानता का सिद्धांत हर स्थिति में लागू नहीं होता
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि समानता का सिद्धांत हर स्थिति में एक जैसी सजा लागू करने का आदेश नहीं देता। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ प्रबंधक का पद केवल औपचारिक नहीं था बल्कि उसमें अधीनस्थ कर्मचारियों की निगरानी और संस्थान की ईमानदारी बनाए रखने की विशेष जिम्मेदारी शामिल थी।

बड़े अधिकारी से अधिक ईमानदारी की अपेक्षा
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि उच्च पद पर बैठे अधिकारी से अधिक ईमानदारी और जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है। इसलिए उसके द्वारा किया गया कदाचार अधिक गंभीर माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक अथॉरिटी द्वारा दी गई सजा को असंगत या मनमानी नहीं कहा जा सकता। इसलिए इसमें न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं था। कोर्ट ने बैंक की अपील स्वीकार करते हुए वरिष्ठ प्रबंधक की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है।
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