केंद्र सरकार ने कहा कि किसी नियुक्ति में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए चयन समिति में न्यायिक सदस्य का होना जरूरी नहीं है। केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून पर रोक लगाने की मांग वाली याचिकाओं का विरोध करते हुए दायर हलफनामे में यह बात कही है।
केंद्र ने हलफनामे में तर्क दिया कि याचिकाएं इस बुनियादी भ्रांति पर आधारित हैं कि किसी संस्थान की आजादी सिर्फ तभी बरकरार रखी जा सकती है, जब विशेष लोगों वाली चयन समिति हो। समिति में वरिष्ठ सरकारी पदाधिकारियों या मंत्री की उपस्थिति यह मानने का आधार नहीं हो सकती कि समिति पूर्वाग्रह से ग्रस्त होगी।
138 पन्नों के हलफनामे में केंद्र सरकार ने याचिकाकर्ता के इस आरोप से भी इन्कार किया कि दोनों चुनाव आयुक्तों को 14 मार्च को जल्दबाजी में नियुक्त किया गया था, क्योंकि 15 मार्च को अदालत में सुनवाई होने वाली थी। हलफनामे में कहा है, इतने व्यापक परिमाण, भौगोलिक विस्तार और आयाम वाले आम चुनाव के साथ चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए अकेले अपने कार्यों का निर्वहन करना मानवीय रूप से संभव नहीं था, लिहाजा 14 मार्च को दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की गई। मालूम हो, चुनाव कार्यक्रम 16 मार्च को घोषित हुआ था और इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है। केंद्र ने 2023 के कानून के खिलाफ कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से दायर अंतरिम आवेदनों के जवाब में हलफनामा दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला संसद के दखल तक ही प्रभावी
केंद्र ने कहा, अनूप बर्नवाल मामले में दिए गए फैसले में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में संसद के हस्तक्षेप करने तक ‘खालीपन’ को भरने का प्रावधान किया गया था। ऐसे में 2023 का कानून चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में महत्वपूर्ण सुधार है। यह अधिक लोकतांत्रिक, सहयोगात्मक, समावेशी और सांविधानिक ढांचे के अनुरूप है।
यह था सुप्रीम कोर्ट का फैसला
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि केंद्र सरकार ने नया कानून बनाकर अनूप बर्नवाल मामले में संविधान पीठ के फैसले को पलट दिया है। फैसले में कोर्ट ने निर्देश दिया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता व भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक समिति की दी गई सलाह के आधार पर होनी चाहिए। केंद्र ने नए कानून में मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर प्रधानमंत्री की ओर से नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को समिति में शामिल करने का प्रावधान किया है।
सीईसी को हासिल है सांविधानिक सुरक्षा
केंद्र ने कहा, चुनाव आयोग या किसी अन्य संगठन या अथॉरिटी की स्वतंत्रता, चयन समिति में न्यायिक सदस्य की उपस्थिति से तय नहीं होती। याचिकाकर्ताओं का यह कहना कि न्यायिक सदस्यों के बिना चयन समितियां हमेशा पक्षपातपूर्ण होंगी, पूर्णत: गलत है। उच्च सांविधानिक पद के रूप में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) को अंतर्निहित सांविधानिक सुरक्षा प्राप्त है, जो उन्हें निष्पक्ष कार्य करने में सक्षम बनाती है।
कार्यपालिका ने ही की 73 साल तक नियुक्ति, पक्षपात के दावे गलत
केंद्र ने कहा, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कानून बनाए जाने से पहले 1950 से 2023 यानी 73 वर्षों तक, चुनाव आयुक्तों को विशेष रूप से कार्यपालिका द्वारा नियुक्त किया जा रहा था। यह तथ्य पक्षपात के सभी दावों को झुठलाता है। सरकार ने ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुिक्त के फैसले का भी बचाव किया। कहा, उनकी योग्यता या क्षमता पर कोई आपत्ति नहीं है। हलफनामे में कहा है, चुनाव आयोग के खिलाफ कोई आरोप नहीं हैं। नुकसानदेह बयानों के आधार पर राजनीतिक विवाद पैदा करने की कोशिश की जा रही है। केंद्र ने याचिकाकर्ताओं के इस दावे का खंडन किया कि नियुक्तियों की कोई सूची विपक्ष के साथ साझा नहीं की। बृहस्पतिवार को मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है।